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*वरिष्ठ जन ही परिवार की नींव होती हैः शुभदा गोयल*

11-Mar-2021

दुर्ग(शोर सन्देश) राजेश श्रीवास्तव जिला एवं सत्र न्यायाधीशध्अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकरण दुर्ग  के मार्गदर्शन एवं निर्देशन में शुभदा गोयल व्यवहार न्यायाधीश वर्ग एवं सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण राहुल शर्मा द्वारा करुणा नामक विशेष जागरूकता कार्यक्रम के अंतर्गत पुलगांव चौक स्थित वृद्धाश्रम में विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें न्यायाधीशों ने वृद्धजनों को चिन्हित किया जिन्हें भरण-पोषण की आवश्यकता है किंतु उन की संताने भरण-पोषण प्रदान नहीं कर रहे हैं। वृद्धाश्रम में एक वृद्धा ने अपनी समस्या बताई उन्होंने बताया कि उनके 3 पुत्र हैं। एक सबसे बड़ा पुत्र की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है वही 2 पुत्र जो कि अच्छी कंपनी में नौकरी करते हैं दोनों पुत्रों के द्वारा उनको घर से निकाल दिया एवं उनके नाम से स्थित संपत्ति को भी अपने नाम करवा लिया एक वृद्ध ऐसे भी थे जो कि वृद्ध आश्रम में रहते हुए भी अपने बच्चों का पालन पोषण करते हैं। न्यायाधीशों द्वारा पूछे जाने पर क्या वह अपने बच्चों के विरुद्ध भरण पोषण की मांग करना चाहते हैं जिस पर वृद्धजनों ने अपने बच्चों को किसी प्रकार की तकलीफ ना देने की बात, किसी प्रकार की भाषण भरण पोषण की मांग अपने बच्चों से नहीं करना व्यक्त किया गया। बहुत से वृद्ध है जिनकी कोई संतान नहीं है और ना ही उनका कोई आय का स्रोत है सरकार की पेंशन योजना का लाभ नहीं मिल पा रहे है क्योंकि उनका नाम बीपीएल सूची में नहीं है जिस कारण उन्हें बहुत सारी समस्याएं दैनिक जीवन में रही है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए माता पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों भरण-पोषण कल्याण अधिनियम 2007 के तहत अपने संतानध्परिवारजनों से भरण पोषण एवं रहन सहन की सुविधा प्राप्त कर सकते हैं तथा इसके लिए विधि अनुसार परिवार न्यायालय में प्रकरण भी दर्ज किये जा सकते हैं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ऐसे वृद्धजनों के लिए भरण-पोषण की राशि संतानों से दिलाये जाने के लिए प्रबल रूप से खडा होकर उन्हें पूरी तरह से विधिक सहायता हेतु मदद करेगा तथा उन्हें निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करते हुए शासकीय व्यय पर पैनल अधिवक्ता भी उपलब्ध करायेगा वरिष्ठ जन ही परिवार की नींव होती है। लेकिन आज की पीढ़ी वरिष्ठ के साथ रहना पसन्द नहीं करते। उनका अकेलापन उन्हें शारीरिक मानसिक रूप से कमजोर कर देता है। जीवन के अंतिम पड़ाव में जब इनके हाथ पाँवों में ताकत नहीं रहती ऐसे समय मे परिवार से अलग रहकर भोजन बनाना अपनी संतान से अलग रह जीवन जीना बहुत कठिन हो जाता हैं। बेटे बहु उनको इलाज के लिए रुपये तक नहीं देते। बहुत कम पेंशन से दवाई खर्च करना होता है। यदि उनकी पेंशन मिलती है तो देखरेख करते है और पेंशन मिले तो माता पिता बोझ लगने लगते हैं। आज की पीढ़ी उन्हें वृद्धाश्रम पहुंचा देती हैं। 



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