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अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान ने अनुसंधान के लिए एमिटी विवि के साथ समझौता किया*

09-Oct-2020

नई दिल्ली (शोर सन्देश) आयुष मंत्रालय की स्वास्थ्य सेवा की आयुष प्रणालियों को प्रोत्साहन देने और उनका विकास करने के लिए भागीदारी करने की आयुष मंत्रालय की नीति को आगे बढ़ाते हुए इस मंत्रालय के अधीन अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए), नई दिल्ली ने एमिटी विश्वविद्यालय के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौता ज्ञापन में आयुर्वेद विज्ञान में अनुसंधान को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इस संस्थान का समझौता ज्ञापन एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन के साथ है, जिसकी स्थापना 2018 में एमिटी विश्वविद्यालय द्वाराभारतीय चिकित्सा पद्धति के बढ़ते महत्व को मान्यता देने के लिए की गई थी। इस समझौता ज्ञापन में आयुर्वेदिक दवाइयों की गुणवत्ता और मानकीकरण के साथ-साथ प्राकृतिक उत्पाद रसायन विज्ञान और फार्मेसी में पीएचडी कार्यक्रमों में सहयोग की कल्पना की गई है। इसमें फार्मास्युटिक्, फार्माकोडायनामिक्स एवं फार्माकोकाइनेटिक्स में अध्ययन की सहयोग के संभावित क्षेत्रों के रूप में पहचान की गई है। यह समझौता ज्ञापन संयुक्त परियोजनाओं और प्रकाशनों को भी बढ़ावा देगा। इस साझेदारी से आयुर्वेद में कुछ अत्याधुनिक अनुसंधान के साथ-साथ विश् स्तर पर आयुर्वेदिक विज्ञान के साथ जुड़े ज्ञान को बढ़ावा देने और उसका प्रसार करने में अच्छे परिणाम मिलने की उम्मीद है। इससे आधुनिक विज्ञान के साथ परम्परागत ज्ञान का एकीकरण करने और आयुर्वेद अनुसंधान में नये आयाम जोड़ने में मदद मिलेगी। आयुष मंत्रालय मौजूदा महामारी परिदृश्य में वैश्विक स्तर पर चिकित्सा की भारतीय पद्धति को शुरू करने और उसे बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। आयुर्वेद ने रोगनिरोधी समाधान उपलब् कराकर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। इन समाधानों की व्यवहार्यता वैज्ञानिक अध्ययनों के माध्यम से स्थापित हुई है। मंत्रालय ने जनता में उपलब्ध आयुष स्वास्थ् समाधानों की गहराई और उसके दायरे को बढ़ाने के लिए अपने जैसी सोच वाले जैसे हितधारक संस्थानों के साथ हिस्सेदारी करने की जरूरत को स्वीकार किया है। मंत्रालय ने आयुर्वेद क्षेत्र में संसाधनों के प्रवाह को बढ़ाने की रणनीति के रूप में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) को भी प्रोत्साहित किया है। मौजूदा समझौता ज्ञापन इसी दृष्टिकोण का परिणाम है। दोनों संस्थान ज्ञान और प्रक्रियाओं को विकसित करने के लिए मिलकर काम करेंगे, जिनका राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में उपयोग किया जाएगा और ये आबादी के पैमाने पर प्रासंगिक होंगे। 



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