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जशपुर में टिकाऊ खेती की पहल, हरी खाद से सुधरेगी मिट्टी की सेहत

18-Apr-2026
रायपुर, (शोर संदेश)   मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में टिकाऊ और जैविक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। इसी क्रम में जशपुर जिले में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के उद्देश्य से हरी खाद के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
कृषि विभाग द्वारा जशपुर जिले के सभी विकासखंडों में इस वर्ष 600 हेक्टेयर क्षेत्र में हरी खाद का प्रदर्शन किया जा रहा है। किसानों से अपील की गई है कि वे कृषि विभाग के मैदानी अमले से संपर्क कर हरी खाद तकनीक अपनाएं, जिससे मिट्टी की सेहत में सुधार के साथ दीर्घकालीन उत्पादकता सुनिश्चित हो सके।
हरी खाद के अंतर्गत ढेंचा, सनई, मूंग, उड़द और बरसीम जैसी फसलों को खेत में उगाकर 40 से 50 दिन बाद जुताई कर मिट्टी में मिला दिया जाता है। इसके पश्चात 2 से 3 सप्ताह बाद मुख्य फसल की बुवाई की जाती है। यह प्रक्रिया मिट्टी में प्राकृतिक पोषक तत्वों की पूर्ति करती है।
हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में नाइट्रोजन, पोटाश एवं अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है, साथ ही जैविक पदार्थों में वृद्धि होती है। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता बेहतर होती है और भूमि भुरभुरी एवं अधिक उपजाऊ बनती है। हरी खाद अपनाने से रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया, की आवश्यकता में कमी आती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हरी खाद का उपयोग कम लागत में अधिक लाभ देने वाला उपाय है, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक है। राज्य सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयास किसानों को आत्मनिर्भर और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं।
 

डबरी, मछली पालन और बहुफसली खेती से बदली तकदीर—सगनू बने गांव के प्रेरणास्रोत

17-Apr-2026
रायपुर(शोर संदेश)  ग्रामीण विकास की दिशा में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक प्रभावी माध्यम के रूप में उभरकर सामने आया है। यह योजना केवल रोजगार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहकर स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने में भी अहम भूमिका निभा रही है। इसका जीवंत उदाहरण अरौद डुबान क्षेत्र के ग्राम कलारबाहरा निवासी सगनू राम की प्रेरक सफलता कहानी है।
सगनू राम एक छोटे कृषक परिवार से हैं। सीमित भूमि और वर्षा आधारित खेती के कारण उनकी आय अस्थिर रहती थी। सिंचाई की सुविधा न होने से वे वर्ष में केवल एक ही फसल ले पाते थे, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर बनी रहती थी।
परिस्थितियों में बदलाव तब आया जब उन्हें ग्राम पंचायत के माध्यम से मनरेगा योजना की जानकारी मिली। उन्होंने वर्ष 2023-24 में अपने खेत में 25×25 मीटर की डबरी निर्माण के लिए आवेदन किया, जिसे स्वीकृति मिली। लगभग 2.98 लाख रुपये की लागत से निर्मित इस डबरी ने उनके खेत में स्थायी जल स्रोत उपलब्ध करा दिया।
डबरी बनने के बाद उनकी खेती में उल्लेखनीय परिवर्तन आया। अब वे नियमित सिंचाई कर पा रहे हैं, जिससे 2 एकड़ में धान की खेती का उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बढ़े हैं। इसके साथ ही कृषि विभाग के सहयोग से उन्होंने 1.5 एकड़ में माड़िया (रागी) की खेती शुरू की, जिससे उन्हें लगभग 60 हजार रुपये की अतिरिक्त आय हुई।

     सगनू राम ने डबरी का उपयोग मछली पालन के लिए भी किया, जिससे उन्हें करीब 30 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आमदनी होने लगी। इस तरह जल संरक्षण, बहुफसली खेती और मछली पालन को जोड़कर उन्होंने एक सशक्त और टिकाऊ आजीविका मॉडल विकसित किया है।
उन्होंने आधुनिक कृषि पद्धतियों—जैसे फसल चक्र, जैविक खाद का उपयोग और बेहतर जल प्रबंधन तकनीकों—को भी अपनाया है, जिससे उत्पादन बढ़ने के साथ लागत में कमी आई है। भविष्य में वे सब्जी उत्पादन और ड्रिप सिंचाई तकनीक अपनाने की योजना बना रहे हैं।
आज सगनू राम न केवल आर्थिक रूप से सशक्त हुए हैं, बल्कि गांव के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। उनकी सफलता से प्रेरित होकर अन्य ग्रामीण भी मनरेगा के तहत डबरी निर्माण और उन्नत कृषि गतिविधियों की ओर आगे बढ़ रहे हैं।
इस सफलता के पीछे ग्राम पंचायत, मनरेगा योजना और कृषि विभाग का समन्वित प्रयास रहा है। समय पर मार्गदर्शन और सहायता ने सगनू राम के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है।
सगनू राम की यह कहानी साबित करती है कि योजनाओं का सही उपयोग और नवाचार के साथ किया गया परिश्रम सीमित संसाधनों में भी आत्मनिर्भरता की राह खोल सकता है। यह ग्रामीण भारत के लिए आशा, प्रेरणा और विकास का सशक्त संदेश है।



 

किसान हितैषी योजनाओं से बदली संजय साहू की किस्मत, नवाचार से बने आत्मनिर्भर

17-Apr-2026
रायपुर,(शोर संदेश)  राज्य शासन की किसान हितैषी योजनाएं अब ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों के जीवन में ठोस बदलाव ला रही हैं। जांजगीर-चांपा जिले के पामगढ़ तहसील अंतर्गत ग्राम बिलारी के किसान संजय कुमार साहू इसकी एक प्रेरक मिसाल बनकर उभरे हैं, जिन्होंने पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर नवाचार अपनाते हुए आत्मनिर्भरता की नई पहचान बनाई है।
पहले संजय साहू अन्य किसानों की तरह केवल धान की पारंपरिक खेती पर निर्भर थे, जिससे आय सीमित थी। बेहतर आय और नई संभावनाओं की तलाश में उन्होंने एक एकड़ भूमि पर ग्राफ्टेड बैंगन की खेती शुरू की। प्रारंभिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने लगातार सीखने और मेहनत करने का संकल्प बनाए रखा। पिछले चार वर्षों से वे सफलतापूर्वक इस खेती को कर रहे हैं और हर वर्ष बेहतर उत्पादन प्राप्त कर रहे हैं।
संजय साहू रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर जैविक उपायों का उपयोग करते हैं, जिससे उनकी फसल सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण रहती है। इस कार्य में उनकी पत्नी भी सक्रिय सहयोग देती हैं, जिससे यह खेती उनके परिवार के लिए एक सशक्त आजीविका का माध्यम बन गई है।
ग्राफ्टेड बैंगन की खेती से उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जहां पहले धान की खेती से सीमित आमदनी होती थी, वहीं अब वे सालाना 4 लाख रुपये से अधिक की आय अर्जित कर रहे हैं। इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और बच्चों की शिक्षा तथा भविष्य की योजनाएं अधिक सुरक्षित हो सकी हैं।
उन्होंने खेती में आधुनिक तकनीकों को भी अपनाया है। ड्रिप इरिगेशन और प्लास्टिक मल्चिंग के उपयोग से पानी की बचत के साथ उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार हुआ है। उद्यानिकी विभाग से उन्हें ग्राफ्टेड पौधे, मल्चिंग सामग्री, स्प्रिंकलर पाइप तथा पैक हाउस के लिए अनुदान प्राप्त हुआ, जिससे लागत में कमी आई। इसके अलावा, सौर सुजला योजना के तहत मिले सोलर पंप ने सिंचाई की समस्या को लगभग समाप्त कर दिया है।
आज संजय साहू की फसल स्थानीय बाजार में बेहतर कीमत पर बिक रही है और वे एक प्रगतिशील किसान के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुके हैं। उनकी सफलता कहानी उन किसानों के लिए प्रेरणा है, जो पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर आधुनिक तकनीकों और नवाचार को अपनाना चाहते हैं। 
 

क्रेडा विभाग की योजनाओं से दो वर्षों में आमजन के जीवन में आया सकारात्मक बदलाव

16-Apr-2026
रायपुर, शोर संदेश )।  अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में क्रेडा विभाग द्वारा किए जा रहे कार्यों ने आमजन के जीवन में उल्लेखनीय और सकारात्मक परिवर्तन लाया है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मार्गदर्शन में सौर ऊर्जा आधारित प्रणालियों के बेहतर उपयोग पर विशेष जोर दिया जा रहा है, जिससे विकास की गति को नई दिशा मिली है। विभाग की विभिन्न योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के परिणामस्वरूप अब लोगों को बुनियादी सुविधाएं अधिक सरलता और सहजता से उपलब्ध हो रही हैं। सौर ऊर्जा के उपयोग से जहां एक ओर स्वच्छ पेयजल और सिंचाई व्यवस्थाएं सुदृढ़ हुई हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बिना बिजली बिल के निरंतर रोशनी सुनिश्चित हो रही है। इससे न केवल लोगों का दैनिक जीवन अधिक सुविधाजनक हुआ है, बल्कि उनके जीवन स्तर में स्थायी और सकारात्मक सुधार लाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
ग्रामीण एवं कस्बाई क्षेत्रों में जल जीवन मिशन के अंतर्गत भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय की पहल पर प्रत्येक परिवार तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।  क्रेडा विभाग द्वारा पिछले दो वर्षों में जल जीवन मिशन अंतर्गत जशपुर जिले में 114 सोलर ड्यूल पंप स्थापित किए गए हैं। इनसे पेयजल आपूर्ति के साथ-साथ सिंचाई के लिए सस्ती एवं सुलभ ऊर्जा उपलब्ध हो रही है। सोलर पंपों के उपयोग से किसानों की डीजल एवं बिजली पर निर्भरता कम हुई है, जिससे उनकी लागत में कमी आई है और आय में वृद्धि हुई है। पानी की उपलब्धता बढ़ने से किसान वर्षभर खेती कर पा रहे हैं, जिससे उत्पादन में भी वृद्धि हुई है। वहीं घर के समीप जल उपलब्ध होने से महिलाओं को दूर से पानी लाने की परेशानी से राहत मिली है।
जशपुर जिले में सार्वजनिक स्थलों पर बेहतर प्रकाश व्यवस्था के लिए सोलर हाई मास्ट योजना के तहत ग्रामों, कस्बों और शहरी क्षेत्रों के प्रमुख चौक-चौराहों पर संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं। पिछले दो वर्षों में 80 सोलर हाई मास्ट लगाए जा चुके हैं। इन सौर ऊर्जा आधारित लाइटों से रात्रिकालीन आवागमन अधिक सुरक्षित और सुगम हुआ है। साथ ही, दुर्घटनाओं और अपराधों में भी कमी आई है। जहां बिजली आपूर्ति सीमित या बाधित रहती है वहां भी ये हाई मास्ट निर्बाध रूप से रोशनी प्रदान कर रहे हैं।
कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ में सौर सुजला योजना किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। इस योजना के अंतर्गत जशपुर जिले में पिछले दो वर्षों में  800 सोलर पंप स्थापित किए गए हैं, जिनसे सिंचाई सुविधाओं का व्यापक विस्तार हुआ है। सोलर पंपों के उपयोग से किसानों को बिजली बिल से मुक्ति मिली है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है। साथ ही कृषि उत्पादन में वृद्धि, भू-जल संरक्षण एवं संवर्धन, तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने जैसे सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
 

हरी खाद बनेगी मिट्टी की संजीवनी, किसानों को कृषि विभाग की बड़ी सलाह

13-Apr-2026
रायपुर(शोर संदेश)। हरी खाद मिट्टी की उपजाऊ शक्ति, जैविक पदार्थ और नत्रजन (नाइट्रोजन) बढ़ाने के लिए उगाई जाने वाली दलहनी फसलें (जैसे- ढैंचा, सनई, मूंग, लोबिया) हैं, जिन्हें फूल आने से पहले खेत में ही जोतकर मिला दिया जाता है। यह मृदा की संरचना सुधारती है, नमी बनाए रखती है और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम कर लागत घटाती है। हरी खाद का उपयोग मिट्टी के लिए किसी जीवनदायिनी संजीवनी से कम नहीं है।
उर्वरता तेजी से घट रही धरती जो कभी सोना उगलती थी, आज थकान से बोझिल दिखने लगी है। रासायनिक उर्वरकों की अंधाधुंध दौड़ और लगातार सघन खेती ने मिट्टी की सेहत को भीतर तक कमजोर कर दिया है। ऐसे समय में कृषि विभाग ने किसानों के सामने एक सरल, सस्ता और टिकाऊ उपाय रखा है, हरी खाद, जो सिर्फ खेती नहीं, बल्कि धरती के पुनर्जन्म की कहानी लिख सकती है।
कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे इस खरीफ सीजन से ही हरी खाद को अपनाएं। विभाग का मानना है कि बढ़ती जनसंख्या और घटते जोत रकबा के कारण किसान एक ही खेत पर बार-बार खेती करने को मजबूर हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता तेजी से घट रही है।
जैविक कार्बन और जरूरी पोषक तत्वों की कमी अब साफ दिखाई देने लगी है। हरी खाद केवल विकल्प नहीं, बल्कि टिकाऊ खेती की दिशा में निर्णायक कदम है। यह मिट्टी को पुनर्जीवित करने का सबसे सस्ता और प्रभावी माध्यम है। आज जब खेती लागत के बोझ तले दब रही है और मिट्टी अपनी ताकत खो रही है, तब हरी खाद उम्मीद की वह हरियाली है जो धरती को फिर से जीवंत कर सकती है।
कृषि विभाग के अधिाकारियों ने बताया कि हरी खाद उन फसलों को कहा जाता है जिन्हें खेत में उगाकर हरी अवस्था में ही मिट्टी में मिला दिया जाता है। ढैंचा, सन, मूंग, उड़द, लोबिया, बरसीम जैसी दलहनी फसलें इसमें प्रमुख हैं। इनकी जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में जमा करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसान महंगे यूरिया से करता है। हरी खाद का उपयोग मिट्टी के लिए किसी जीवनदायिनी संजीवनी से कम नहीं है।
हरी खाद से मिट्टी में नाइट्रोजन की पूर्ति होती है, फास्फोरस की घुलनशीलता बढ़ती है, जिंक, आयरन, कॉपर जैसे सूक्ष्म तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है। इसके अलावा मिट्टी की संरचना में सुधार, भुरभुरापन, नमी धारण क्षमता में वृद्धि और खरपतवार व कीटों पर प्राकृतिक नियंत्रण भी मिलता है।
ढैंचा एक एकड़ में 55 से 60 किलो नाइट्रोजन देता है, जो करीब 3 बोरी यूरिया के बराबर है। इसके अलावा सनाई 45-50 किलो, बरसीम 48-50 किलो और लोबिया/ग्वारफली 22-30 किलो नाइट्रोजन प्रति एकड़ देती है।
सिंचित क्षेत्रों में मई में बुवाई करें, असिंचित क्षेत्रों में जून (वर्षा पूर्व) में बुवाई करें। 40-50 दिन बाद हरी अवस्था में ही जुताई कर मिट्टी में मिला दें। कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे इस पारंपरिक लेकिन वैज्ञानिक पद्धति को अपनाएं और अपनी मिट्टी, अपनी आय और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करें।



 

हरी खाद - मिट्टी की खोई उर्वरता बढ़ाने का प्राकृतिक समाधान

11-Apr-2026
रायपुर,  (शोर संदेश)।  हरी खाद - मिट्टी की खोई उर्वरता बढ़ाने का प्राकृतिक समाधानमिट्टी की घटती उर्वरता और रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता को लेकर कृषि विभाग गंभीर दिखाई दे रहा है। जिसके बेहतर व समाधान के रूप में विभाग द्वारा सूरजपुर जिले के किसानों से, हरी खाद अपनाने का आह्वान किया है।
कृषि विभाग ने स्पष्ट किया है कि बढ़ती जनसंख्या और घटते जोत के कारण किसान एक ही भूमि पर सघन खेती करने को विवश हैं। इससे मिट्टी में जैविक कार्बन एवं पोषक तत्वों की तेजी से गिरावट आ रही है। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग और पशुधन में कमी के चलते गोबर खाद की उपलब्धता भी घटती जा रही है। ऐसी विषम परिस्थिति में मृदा स्वास्थ्य को बनाए रखने का सबसे सरल, सस्ता और टिकाऊ उपाय हरी खाद ही है। कृषि विभाग ने किसानों को हरी खाद अपनाने की सलाह देते हुए कहा कि यह न केवल मिट्टी को पुनर्जीवित करने का सबसे सस्ता उपाय है, बल्कि टिकाऊ खेती की दिशा में एक निर्णायक कदम भी है।
हरी खाद (ग्रीन मेन्युर) उन फसलों को कहते हैं जिन्हें विशेष रूप से उगाकर हरी अवस्था में ही खेत में जुताई करके मिट्टी में मिला दिया जाता है। ये मुख्यतः दलहनी फसलें होती हैं जिनकी जड़ों में पाया जाने वाला राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करता है - वही काम जो किसान अब तक महंगे यूरिया से कराता आया है। हरी खाद की प्रमुख फसलों में ढैंचा, सन, मूंग, उड़द, लोबिया, चरोटा, ग्वारफली एवं बरसीम शामिल हैं।
हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है, फॉस्फोरस की घुलनशीलता बढ़ती है और जिंक, आयरन, कॉपर, मैग्नीज जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी सुलभ हो जाते हैं। मिट्टी की भौतिक संरचना सुधरती है, वह नरम और भुरभुरी बनती है तथा जल धारण क्षमता बढ़ने से सूखे में भी फसल को राहत मिलती है। इसके साथ ही खरपतवारों का  प्राकृतिक नियंत्रण होता है, लाभकारी मृदा जीवाणुओं की संख्या बढ़ती है और आगामी फसल में कीट व रोग का प्रकोप घटता है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि रासायनिक खाद की जरूरत कम होने से किसान की उर्वरक लागत में उल्लेखनीय कमी आती है और आय में वृद्धि होती है।
जिला सूरजपुर के सहायक मृदा परीक्षण अधिकारी ने किसानों को हरी खाद के संबंध मे जानकारी देते हुए बताया कि ढैंचा सर्वाधिक प्रभावी हरी खाद फसल है जो प्रति एकड़ 55 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती है, जो लगभग 120 से 130 किलोग्राम यूरिया यानी करीब तीन बोरी के बराबर है। सन से 45 से 50 किलोग्राम, बरसीम से 48 से 50 किलोग्राम तथा लोबिया एवं ग्वारफली से 22 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति एकड़ प्राप्त होती है।
कृषि विभाग द्वारा किसानों को सलाह दी है कि खरीफ सीजन में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने पर मई माह में छिड़काव विधि से बुवाई करें। असिंचित क्षेत्रों में वर्षा से पूर्व जून माह में बुवाई करें और जब फसल 40 से 50 दिन की हो जाए, तब उसे हरी अवस्था में ही जुताई करके मिट्टी में मिला दें। रबी सीजन के लिए बरसीम एवं रिजका की बुवाई अक्टूबर-नवम्बर में करें और बुवाई से 50 से 60 दिन बाद खेत में पलटें।
कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे इस खरीफ सीजन से ही हरी खाद को अपनी खेती का अनिवार्य हिस्सा बनाएं। रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती लागत और घटती मृदा उर्वरता के इस दौर में हरी खाद न केवल किसान की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ भूमि भी सुरक्षित रखेगी। अधिक जानकारी के लिए किसान जिला कृषि कार्यालय एवं मृदा परीक्षण कार्यालय सूरजपुर से संपर्क कर सकते हैं।

 

 


एक जिला एक उत्पाद” योजना से बदली किसानों की तकदीर, अदरक खेती बनी मुनाफे का जरिया

08-Apr-2026
रायपुर,।  शोर संदेश  सरकार की “एक जिला एक उत्पाद” योजना अब धरातल पर किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रही है। इसी क्रम में बालोद जिले के गुण्डरदेही विकासखंड अंतर्गत ग्राम बघमरा के युवा प्रगतिशील किसान आकाश चंद्राकर ने अदरक की खेती के माध्यम से सफलता की एक नई मिसाल प्रस्तुत की है।
पारंपरिक फसलों से आगे बढ़ते हुए आकाश चंद्राकर ने “एक जिला एक उत्पाद” योजना से प्रेरित होकर अपने लगभग ढाई एकड़ खेत में अदरक की खेती की शुरुआत की। वैज्ञानिक पद्धतियों और बेहतर प्रबंधन के साथ की गई इस खेती से उन्हें उत्कृष्ट उत्पादन प्राप्त हुआ। साथ ही बाजार में अदरक की अच्छी मांग के कारण उन्हें अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिला, जिससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
किसानों को प्रोत्साहित करने और खेती की लागत को कम करने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ शासन के उद्यानिकी विभाग द्वारा राज्य पोषित मसाला क्षेत्र विस्तार कार्यक्रम के अंतर्गत आकाश चंद्राकर को लगभग 49 हजार रुपये का अनुदान प्रदान किया गया। इस वित्तीय सहयोग से उन्हें आधुनिक कृषि संसाधन जुटाने, गुणवत्तापूर्ण बीज एवं तकनीकों का उपयोग करने में सहायता मिली, जिसका सीधा लाभ उत्पादन और गुणवत्ता में दिखाई दिया।
आकाश चंद्राकर बताते हैं कि अदरक की खेती उनके लिए समृद्धि का नया द्वार बनकर आई है। शासन से प्राप्त अनुदान ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्हें बेहतर उत्पादन हासिल करने के लिए प्रेरित किया। उनका मानना है कि सही मार्गदर्शन और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है।
“एक जिला एक उत्पाद” के अंतर्गत अदरक को चयनित किए जाने के बाद जिले के अन्य किसान भी इस नगदी फसल की ओर आकर्षित हो रहे हैं। पारंपरिक फसलों की तुलना में अदरक से प्राप्त अधिक शुद्ध लाभ ने किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है। जिला प्रशासन बालोद और उद्यानिकी विभाग द्वारा उपलब्ध कराई जा रही तकनीकी सलाह एवं अनुदान से खेती अब घाटे का सौदा नहीं, बल्कि लाभ का माध्यम बनती जा रही है।
चंद्राकर ने केंद्र एवं राज्य सरकार की किसान हितैषी नीतियों की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विश्वास जताया कि शासन की इस पहल से बालोद जिला अदरक उत्पादन के क्षेत्र में एक नई पहचान स्थापित करेगा।

आधुनिक तकनीक से बदली खेती की तस्वीर, ग्राफ्टेड बैंगन से किसान को बड़ा मुनाफा

08-Apr-2026
रायपुर,।  शोर संदेश छत्तीसगढ़ में कृषि को लाभकारी बनाने की दिशा में शासन की योजनाएं अब जमीन पर असर दिखाने लगी हैं। मुंगेली जिले के पथरिया विकासखंड अंतर्गत ग्राम खुटेरा के किसान बसदेव राजपूत ने आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर सीमित भूमि में उल्लेखनीय आय अर्जित कर एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है।
करीब 1.70 हेक्टेयर भूमि के स्वामी राजपूत ने अपनी कुल जमीन में से लगभग 1 एकड़ क्षेत्र में उद्यानिकी फसल के रूप में ग्राफ्टेड बैंगन की खेती की। उन्होंने परंपरागत खेती के बजाय ड्रिप इरिगेशन सिस्टम और प्लास्टिक मल्चिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाया, जिससे जल संरक्षण के साथ-साथ फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार हुआ।
शासन की राष्ट्रीय कृषि विकास योजना वर्ष 2025-26 के अंतर्गत उन्हें तकनीकी मार्गदर्शन के साथ लगभग 30 हजार रुपये का अनुदान भी प्राप्त हुआ। इस सहायता ने खेती की लागत को कम करने और आधुनिक संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इन प्रयासों का सकारात्मक परिणाम सामने आया। राजपूत को प्रति एकड़ लगभग 130 क्विंटल बैंगन का उत्पादन प्राप्त हुआ। बाजार में 15 से 20 रुपये प्रति किलोग्राम के थोक मूल्य पर फसल की बिक्री कर उन्होंने कुल लगभग 1 लाख 95 हजार रुपये की आय अर्जित की, जबकि उनकी कुल लागत लगभग 62 हजार रुपये रही। इस प्रकार उन्हें करीब 1 लाख 33 हजार रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ, जो पारंपरिक खेती की तुलना में कहीं अधिक है।
राजपूत का कहना है कि उन्नत तकनीकों के उपयोग से न केवल उत्पादन में वृद्धि हुई है, बल्कि कीट एवं रोग नियंत्रण भी पहले की अपेक्षा अधिक प्रभावी हुआ है। वर्तमान में उनकी फसल का उत्पादन जारी है और आगामी समय में 30 से 40 क्विंटल अतिरिक्त उत्पादन की संभावना है, जिससे उनकी आय में और वृद्धि होने की उम्मीद है।
उनकी सफलता से प्रेरित होकर आसपास के किसान भी अब ड्रिप इरिगेशन और आधुनिक खेती तकनीकों को अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं। इससे यह स्पष्ट है कि शासन की योजनाओं, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और किसान की मेहनत के समन्वय से कृषि को एक लाभकारी और टिकाऊ व्यवसाय के रूप में विकसित किया जा सकता है।


 

कुसुम की खेती के प्रति बालोद जिले के किसानों में बढ़ा रूझान

04-Apr-2026
रायपुर, 04 अप्रैल 2026 सरकार की तिलहन प्रोत्साहन योजनाओं और जिला प्रशासन के नीर चेतना अभियान का सकारात्मक असर अब बालोद के खेतों में दिखने लगा है। 
कृषि विभाग के कृषक चौपाल और फसल चक्र परिवर्तन के प्रति जागरूकता अभियान से प्रेरित होकर जिले के किसानों ने पारंपरिक खेती के साथ-साथ तिलहन उत्पादन, विशेषकर कुसुम की खेती की ओर कदम बढ़ाए हैं। 
कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण का परिणाम है कि बालोद जिले में जिस कुसुम की खेती का रकबा पहले शून्य था, वह इस वर्ष बढ़कर 157 हेक्टेयर तक पहुंच गया है। उन्नत बीजों का चयन, कतार पद्धति से बुआई और संतुलित उर्वरक प्रबंधन के कारण वर्तमान में फसल लाभदायक साबित हुआ है।
स्थानीय किसानों के अनुसार, कुसुम की खेती कई मायनों में फायदेमंद है, कम जल खपत, इसे बहुत ही सीमित सिंचाई की आवश्यकता होती है। यह फसल कम समय में तैयार हो जाती है और लागत भी न्यूनतम आती है। कुसुम की खेती मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने में सहायक मानी जाती है। मौसम अनुकूल रहने पर अच्छी पैदावार से किसानों की आय दोगुनी होने की प्रबल उम्मीद है। घरेलू तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देने और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से जिले के सभी विकासखंडों के 37 ग्रामों के 194 कृषकों ने पहली बार नवीन तिलहन फसल के रूप में कुसुम का प्रदर्शन लिया है। भविष्य में कुसुम की खेती के विस्तार हेतु बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। कुल कृषकों में से 79 कृषकों ने 101 हेक्टेयर क्षेत्र में बीज उत्पादन हेतु बीज निगम में पंजीयन कराया है। इससे आने वाले समय में जिले के किसानों को स्थानीय स्तर पर ही उन्नत बीज प्राप्त हो सकेंगे। साथ ही कृषि विभाग के अधिकारियों द्वारा खेतों का नियमित निरीक्षण और कीट प्रबंधन की जानकारी दी जा रही है, जिससे फसल की गुणवत्ता बेहतर बनी हुई है। बालोद जिले के किसानों का यह सामूहिक प्रयास अब आसपास के क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रहा है।

गुलाबों से चमकी किस्मत: सूरजपुर के किसान की सफलता की खुशबू

29-Mar-2026
सूरजपुर, ।  ( शोर संदेश ) यूं तो गुलाब हम सभी को बेहद पसंद होते हैं। गुलाब के विविध रंग बिना कुछ कहे ही मन को अपनी ओर खींच लेते हैं। उनकी मोहक आभा और कोमलता सहज ही मन में आकर्षण उत्पन्न कर देती है। शादी-विवाह, जन्मदिन, त्यौहार या किसी प्रियजन के चेहरे पर मुस्कान लानी हो — गुलाब का फूल या गुलदस्ता हमेशा पहली पसंद रहता है। इसी बढ़ती मांग को अवसर में बदलकर सूरजपुर जिले के ग्राम डुमरिया निवासी किसान भोला प्रसाद अग्रवाल ने आधुनिक खेती के माध्यम से सफलता की एक मिसाल कायम कर दी है।
गुलाबों से महकती सफलता: सूरजपुर के किसान की प्रेरक कहानी
पारंपरिक खेती से आधुनिक पॉलीहाउस तक वर्ष 2023 में उन्होंने परंपरागत खेती से हटकर उन्नत तकनीक अपनाने का निर्णय लिया और 2 एकड़ भूमि में 2 पॉलीहाउस स्थापित किए। करीब 1 करोड़ 20 लाख रुपये की लागत से तैयार इस परियोजना में लगभग 90 लाख रुपये बैंक ऋण, 30 लाख रुपये स्वयं की पूंजी तथा राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड से 50% अनुदान प्राप्त हुआ। पॉलीहाउस में डच किस्म के लगभग 80 हजार गुलाब पौधे लगाए गए, जो नियंत्रित तापमान और उन्नत पोषण प्रबंधन के कारण सालभर उत्पादन देते हैं।
उल्लेखनीय है कि आज के समय में इस फार्म से प्रतिदिन औसतन 3 से 4 हजार गुलाब स्टिक का उत्पादन हो रहा है। तैयार फूलों की आपूर्ति बनारस, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के विभिन्न बाजारों में की जाती है। जिससे औसत मासिक आय 2 से 3 लाख रुपये तक होती है। इसमें  श्रमिक खर्च, खाद, उर्वरक व रखरखाव खर्चों के बाद भी यह खेती बेहद लाभकारी बनी हुई है और नियमित आमदनी का मजबूत स्रोत बन चुकी है।
किसान भोला प्रसाद अग्रवाल बताते हैं कि पारंपरिक खेती में मौसम पर निर्भरता अधिक रहती है, लेकिन इस पॉलीहाउस के आधुनिक तकनीक ने जोखिम कम कर दिया। नियंत्रित वातावरण के कारण फूलों की गुणवत्ता बेहतर रहती है और बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं।
अग्रवाल जिले के अन्य किसानों के लिए संदेश देते हुए कहते हैं कि “यदि किसान नई तकनीक अपनाए और शासन की योजनाओं का लाभ ले, तो खेती को भी उद्योग की तरह सफल बनाया जा सकता है।” आज उनकी खेती न केवल परिवार की आय बढ़ा रही है, बल्कि आसपास के लोगों को रोजगार भी दे रही है। आधुनिक खेती का यह मॉडल क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा बन गया है। निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि सही योजना, तकनीक और मेहनत हो तो खेत भी उद्योग बन सकता है और फूल भी भविष्य बदल सकते हैं।

 




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