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हरी खाद, वर्मी कम्पोस्ट और जैविक खाद के उपयोग के लिए किसानों को किया जा रहा प्रोत्साहित

20-Jul-2026
जशपुर। (शोर संदेश) जिले में मृदा स्वास्थ्य सुधार, भूमि की उर्वराशक्ति बनाए रखने और मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाने के उद्देश्य से कृषि विभाग द्वारा लगातार विभिन्न योजनाओं एवं कार्यक्रमों का संचालन किया जा रहा है। किसानों को हरी खाद, जैविक खाद और मृदा परीक्षण आधारित संतुलित उर्वरक उपयोग के लिए नियमित रूप से प्रोत्साहित एवं जागरूक किया जा रहा है। उप संचालक कृषि जशपुर ने बताया कि कृषि विभाग द्वारा मृदा स्वास्थ्य सुधार के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।
कृषि विभाग द्वारा किसानों को हरी खाद के रूप में ढैंचा, सनई सहित अन्य उपयुक्त फसलों के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में जैविक पदार्थों और जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाने में सहायता मिलती है। इसके साथ ही भूमि की संरचना एवं उर्वराशक्ति में सुधार होता है और लंबे समय में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिलती है। वर्तमान में राज्य शासन द्वारा संचालित हरी खाद कार्यक्रम के माध्यम से किसानों को हरी खाद अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य मृदा में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाना, भूमि की उत्पादन क्षमता को बनाए रखना तथा टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा देना है।
विभाग द्वारा किसानों को गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट और अन्य जैविक खादों के अधिकाधिक उपयोग के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है। इसके साथ ही फसल अवशेषों को जलाने के बजाय खेतों में समावेशित करने के संबंध में किसानों को जागरूक किया जा रहा है, ताकि मिट्टी में जैविक तत्वों की मात्रा बढ़े और भूमि की उर्वराशक्ति दीर्घकाल तक बनी रहे। कृषि विभाग द्वारा नियमित रूप से प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर किसानों को संतुलित और मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक उपयोग के संबंध में जानकारी दी जा रही है। विभाग का उद्देश्य रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि जैविक एवं रासायनिक स्रोतों के वैज्ञानिक और संतुलित उपयोग के माध्यम से समेकित पोषक तत्व प्रबंधन को प्रोत्साहित करना है।
जिले में मृदा परीक्षण के आधार पर किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड प्रदान किए जाते हैं। इसमें संबंधित खेत की मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों की स्थिति के अनुसार उर्वरकों एवं अन्य पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग की अनुशंसा की जाती है। इससे किसान आवश्यकता के अनुरूप उर्वरकों का उपयोग कर सकते हैं और अनावश्यक अथवा असंतुलित उपयोग से बच सकते हैं। मृदा स्वास्थ्य कार्ड के माध्यम से किसानों को यह समझने में भी सहायता मिलती है कि उनके खेत की मिट्टी को किन पोषक तत्वों की आवश्यकता है। इस वैज्ञानिक पद्धति को अपनाने से खेती की लागत को नियंत्रित करने के साथ-साथ मिट्टी के स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिलती है।
कृषि विभाग ने जिले के किसानों से अपील की है कि वे अपने खेतों में उर्वरकों का उपयोग मृदा परीक्षण और कृषि विशेषज्ञों की अनुशंसा के आधार पर ही करें। साथ ही हरी खाद, गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट, अन्य जैविक खादों तथा फसल अवशेषों के समुचित उपयोग को प्राथमिकता दें। विभाग ने कहा है कि मृदा स्वास्थ्य का संरक्षण केवल वर्तमान फसल के बेहतर उत्पादन के लिए ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए कृषि भूमि की उर्वराशक्ति सुरक्षित रखने के लिए भी आवश्यक है। संतुलित पोषण और जैविक खादों के अधिकाधिक उपयोग से भूमि की उत्पादन क्षमता को दीर्घकाल तक बनाए रखने के साथ टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि को बढ़ावा दिया जा सकता है।




 

’किसान क्रेडिट कार्ड योजना से किसानों को मिल रही आर्थिक मजबूती, खेती बन रही अधिक लाभकारी’

18-Jul-2026
रायपुर(शोर संदेश) मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य शासन द्वारा किसानों को खेती-किसानी के लिए समय पर वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना प्रदेश के किसानों के लिए प्रभावी साबित हो रही है। इस योजना के माध्यम से किसानों को कम ब्याज पर समय पर ऋण उपलब्ध हो रहा है, जिससे खाद, बीज और अन्य कृषि आदानों की व्यवस्था समय पर हो रही है तथा कृषि कार्य बिना किसी बाधा के पूरे किए जा रहे हैं। इससे उत्पादन बढ़ने के साथ किसानों की आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ हो रही है।
प्रदेशभर में किसान क्रेडिट कार्ड योजना के माध्यम से बड़ी संख्या में किसान लाभान्वित हो रहे हैं। योजना के तहत किसानों को आवश्यकतानुसार कृषि ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे वे समय पर बुवाई, सिंचाई और अन्य कृषि कार्य कर बेहतर उत्पादन प्राप्त कर रहे हैं।
सरगुजा जिले के ग्राम पंचायत कंचनपुर निवासी किसान एवं किसान मित्र ललन राजवाड़े योजना के सफल लाभार्थियों में शामिल हैं। उन्होंने बताया कि पहले सीमित आर्थिक संसाधनों के कारण खेती के लिए आवश्यक खाद, बीज एवं अन्य कृषि सामग्री समय पर उपलब्ध नहीं हो पाती थी, जिससे उत्पादन प्रभावित होता था। किसान क्रेडिट कार्ड बनने के बाद उन्हें समय पर ऋण मिलने लगा और अब कृषि आदानों की व्यवस्था आसानी से हो जाती है।
ललन राजवाड़े ने बताया कि केसीसी के माध्यम से प्राप्त ऋण से उन्होंने समय पर खाद-बीज एवं अन्य कृषि सामग्री खरीदी, जिससे खेती के सभी कार्य निर्धारित समय पर पूरे हुए और उत्पादन में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ। उन्होंने कहा कि अब खेती पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित, सुविधाजनक और लाभकारी हो गई है।
उन्होंने कहा कि किसान क्रेडिट कार्ड योजना ने किसानों को आर्थिक संकट से उबरने और आत्मविश्वास के साथ खेती करने का अवसर दिया है। समय पर वित्तीय सहायता मिलने से खेती की लागत का प्रबंधन आसान हुआ है और आय बढ़ाने में भी मदद मिल रही है।
किसान ललन राजवाड़े ने किसान हितैषी योजनाओं के लिए प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि किसान क्रेडिट कार्ड योजना किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह योजना किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाते हुए कृषि क्षेत्र को अधिक उत्पादक, टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
 

विलंबित मानसून के बीच धान किसानों के लिए आईसीएआर-एनआईबीएसएम की वैज्ञानिक सलाह

17-Jul-2026
रायपुर( शोर संदेश )  दक्षिण-पश्चिम मानसून में देरी और छत्तीसगढ़ के कई क्षेत्रों में वर्षा की अनिश्चितता को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान (आईसीएआर-एनआईबीएसएम), रायपुर ने प्रदेश के धान किसानों के लिए विशेष कृषि परामर्श जारी किया है। संस्थान ने किसानों से खरीफ मौसम में फसल की सफल स्थापना और संभावित उपज हानि को कम करने के लिए मौसम की स्थिति के अनुरूप समय पर वैज्ञानिक एवं आकस्मिक कृषि उपाय अपनाने की अपील की है।
संस्थान के अनुसार, पर्याप्त वर्षा होते ही किसान स्वस्थ 20-25 दिन पुराने पौधों से अनुशंसित दूरी पर धान की रोपाई शीघ्र पूरी करें। रोपाई में अधिक देरी होने की स्थिति में कम से मध्यम अवधि में पकने वाली धान की किस्मों को प्राथमिकता दी जाए। जहां रोपाई संभव न हो, वहां अंकुरित बीजों से ड्रम सीडर अथवा छिड़काव विधि द्वारा धान की सीधी बुवाई भी अपनाई जा सकती है।
संस्थान के निदेशक डॉ. पी.के. राय ने कहा कि बदलती जलवायु और अनिश्चित वर्षा की परिस्थितियों में समय पर वैज्ञानिक फसल प्रबंधन तथा आकस्मिक योजना अपनाना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने किसानों से स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कृषि सलाह के लिए कृषि विज्ञान केंद्रों और कृषि विशेषज्ञों के नियमित संपर्क में रहने का आग्रह किया।
संस्थान ने संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पर जोर देते हुए फास्फोरस और पोटाश की अनुशंसित मात्रा आधार खाद के रूप में देने तथा नत्रजन उर्वरक का प्रयोग फसल की आवश्यकता के अनुसार विभाजित मात्रा में करने की सलाह दी है। भारी वर्षा की संभावना से ठीक पहले यूरिया का प्रयोग नहीं करने को कहा गया है, ताकि पोषक तत्वों की हानि को कम किया जा सके।
किसानों को समय पर खरपतवार नियंत्रण, खेत में उचित नमी बनाए रखने और जलभराव की स्थिति में प्रभावी जल निकासी सुनिश्चित करने की सलाह भी दी गई है। साथ ही तना छेदक, पत्ती लपेटक जैसे प्रमुख कीटों तथा ब्लास्ट और जीवाणुजनित पत्ती झुलसा जैसे रोगों की नियमित निगरानी करने और आवश्यकता के अनुसार वैज्ञानिक अनुशंसाओं पर आधारित पौध संरक्षण उपाय अपनाने को कहा गया है।
संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने कहा कि विलंबित मानसून की स्थिति में फसल की प्रारंभिक अवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। किसानों को खेत संबंधी कार्यों में अनावश्यक देरी से बचते हुए संतुलित पोषण, प्रभावी खरपतवार नियंत्रण और कीट-रोगों की नियमित निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए।
जिन क्षेत्रों में लंबे समय तक वर्षा की कमी के कारण धान की खेती प्रभावित होने की आशंका है, वहां स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुसार मक्का, अरहर, उड़द, मूंग, तिल और मोटे अनाज जैसी वैकल्पिक फसलों की खेती पर विचार किया जा सकता है। संस्थान ने किसानों से मौसम आधारित कृषि परामर्श और वैज्ञानिक अनुशंसाओं का पालन कर खरीफ फसलों को सुरक्षित रखने की अपील की है।
 

हर महीने की सहायता से आसान हुआ घरेलू खर्च, महतारी वंदन योजना से खुश हैं संतोषी

15-Jul-2026
एमसीबी/15 जुलाई 2026 मुख्यमंत्री  विष्णुदेव साय के नेतृत्व में संचालित महतारी वंदन योजना महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो रही है। योजना के माध्यम से महिलाओं को प्रतिमाह ₹1,000 की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खातों में हस्तांतरित की जा रही है, जिससे वे अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी आगे बढ़ रही हैं। मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिले की अनेक महिलाओं की तरह विकासखंड मनेन्द्रगढ़ के ग्राम भल्लौर की निवासी संतोषी भी इस योजना से लाभान्वित होकर बेहद प्रसन्न हैं।
संतोषी ने बताया कि उन्हें महतारी वंदन योजना के तहत प्रतिमाह ₹1,000 की राशि नियमित रूप से उनके बैंक खाते में प्राप्त हो रही है। अब तक उन्हें योजना की 29 किश्तों के माध्यम से कुल ₹29,000 की आर्थिक सहायता प्राप्त हो चुकी है। उनका कहना है कि यह राशि उनके परिवार के लिए एक महत्वपूर्ण सहयोग सिद्ध हो रही है और इससे घरेलू खर्चों का बोझ काफी हद तक कम हुआ है।
उन्होंने बताया कि योजना से मिलने वाली राशि का उपयोग वे घर के लिए साग-सब्जी, राशन, दैनिक उपयोग की आवश्यक वस्तुओं की खरीद तथा अन्य छोटी-छोटी घरेलू जरूरतों को पूरा करने में करती हैं। पहले इन आवश्यक खर्चों के लिए उन्हें कई बार परिवार के अन्य सदस्यों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन अब हर महीने मिलने वाली नियमित सहायता से वे स्वयं अपनी जरूरतों का प्रबंधन कर लेती हैं। इससे न केवल आर्थिक सुविधा मिली है, बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ा है।
संतोषी का कहना है कि महतारी वंदन योजना महिलाओं को केवल आर्थिक सहायता ही नहीं दे रही, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी प्रदान कर रही है। नियमित रूप से मिलने वाली सहायता राशि के कारण महिलाएं अपने परिवार की आवश्यकताओं में सहयोग कर रही हैं और अपने छोटे-छोटे खर्च स्वयं वहन करने में सक्षम हो रही हैं। इससे परिवार में उनकी भागीदारी और निर्णय लेने की भूमिका भी मजबूत हुई है।
उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार की यह योजना महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक सराहनीय प्रयास है। योजना का लाभ सीधे बैंक खाते में मिलने से पारदर्शिता बनी रहती है और महिलाओं को समय पर सहायता प्राप्त होती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को विशेष रूप से लाभ मिल रहा है।
संतोषी ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि महतारी वंदन योजना उनके जैसी लाखों महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रही है। उन्होंने कहा कि यह योजना महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उनके जीवन स्तर में निरंतर सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उन्होंने प्रदेश सरकार का धन्यवाद देते हुए आशा व्यक्त की कि भविष्य में भी इस प्रकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ महिलाओं को निरंतर मिलता रहेगा।
 

नैनो उर्वरकों से कम लागत में बढ़ा उत्पादन, आधुनिक खेती अपना रहे किसान

15-Jul-2026
रायपुर(शोर संदेश)  मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार किसानों को आधुनिक, टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि पद्धतियों से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। कृषि क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देते हुए किसानों को नैनो उर्वरकों के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे कम लागत में बेहतर उत्पादन के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है।
कोरबा जिले के ग्राम अमगांव निवासी कृषक अमर सिंह कंवर लगभग दो एकड़ भूमि में धान की खेती करते हैं। लंबे समय से पारंपरिक खेती कर रहे कंवर ने पिछले वर्ष पहली बार नैनो उर्वरकों का उपयोग किया। इसके सकारात्मक परिणामों को देखते हुए उन्होंने इस वर्ष भी अपनी फसल में नैनो उर्वरकों के उपयोग का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने सहकारी समिति कनबेरी से समय पर आवश्यक कृषि आदान सामग्री प्राप्त की।
कंवर ने बताया कि नैनो उर्वरकों के उपयोग से खेती की लागत में कमी आई है, जबकि फसल उत्पादन में वृद्धि हुई है। इसके साथ ही उर्वरकों की बर्बादी भी कम हुई है और पर्यावरण के अनुकूल खेती को बढ़ावा मिला है। उनके अनुसार आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने से खेती पहले की तुलना में अधिक प्रभावी और लाभकारी बन रही है।
उन्होंने सहकारी समिति में उपलब्ध व्यवस्थाओं की भी सराहना करते हुए कहा कि किसानों को आवश्यकतानुसार खाद, बीज एवं अन्य कृषि आदान सामग्री सहजता से उपलब्ध कराई जा रही है। समितियों में पर्याप्त भंडारण होने से किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा किसानों की सुविधा के लिए किए जा रहे प्रयासों की प्रशंसा करते हुए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त किया।
राज्य सरकार की किसान हितैषी नीतियों तथा समय पर उपलब्ध कराई जा रही कृषि आदान सामग्री से जिले के किसान आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। नैनो उर्वरकों का बढ़ता उपयोग न केवल उत्पादन बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहा है, बल्कि कम लागत, संतुलित पोषण और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है।
 

फसल विविधीकरण से बढ़ी किसान की आय, उड़द बना मुनाफे का सौदा

14-Jul-2026
रायपुर ।  (शोर संदेश) खेती में समय के साथ बदलाव अपनाने का साहस कई बार ऐसी सफलता की कहानी लिख देता है, जो दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन जाती है। सक्ती जिले के मालखरौदा विकासखंड के ग्राम दिमानी के प्रगतिशील किसान  दाऊ लाल ने भी कुछ ऐसा ही किया। वर्षों तक ग्रीष्मकालीन धान की खेती करने के बाद उन्होंने कृषि विभाग की सलाह पर उड़द की खेती अपनाई और कम समय में अधिक उत्पादन तथा बेहतर आय हासिल की।
दाऊ लाल के पास कुल 4.5 एकड़ कृषि भूमि है। पहले वे ग्रीष्मकालीन धान की खेती करते थे, जिसमें अधिक सिंचाई, बढ़ती लागत और मिट्टी की उर्वरता में कमी जैसी चुनौतियां सामने आती थीं। कृषि विभाग के दलहन, तिलहन एवं मक्का फसल प्रोत्साहन कार्यक्रम के तहत उन्होंने 2.5 एकड़ में कोटा उड़द-04 किस्म की बुवाई की। महज 70 दिनों में फसल तैयार हुई और उन्हें 15 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ।
उड़द की खेती में लगभग 22,500 रुपये की लागत आई, जबकि फसल बेचकर करीब 1.10 लाख रुपये की आय हुई। यानी कम लागत में अधिक लाभ मिला। सबसे बड़ी बात यह रही कि धान की तुलना में सिंचाई के लिए बहुत ही कम पानी आवश्यकता पड़ी। साथ ही कीट एवं रोगों का प्रकोप भी अपेक्षाकृत कम रहा, जिससे खेती का जोखिम और खर्च दोनों घट गए।
दाऊ लाल का कहना है कि उड़द की खेती कम पानी, कम लागत और कम समय में बेहतर मुनाफा देने वाली फसल है। इस सफलता के बाद उन्होंने भविष्य में भी फसल चक्र अपनाते हुए दलहनी फसलों का रकबा बढ़ाने का निर्णय लिया है। कृषि विभाग के अनुसार जल संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य सुधार और किसानों की आय बढ़ाने के लिए ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर दलहन, तिलहन और मक्का जैसी वैकल्पिक फसलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। किसानों को उन्नत बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी भी लगातार उपलब्ध कराई जा रही है। बदलते समय में परंपरागत खेती आगे बढ़कर वैज्ञानिक तरीके और फसल विविधीकरण अपनाने से न केवल किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है, बल्कि जल और मिट्टी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जा सकता है।

 

 


पैडी ट्रांसप्लांटर से धान रोपाई में आई आधुनिकता, बढ़ी किसानों की उम्मीद

13-Jul-2026
रायपुर (शोर संदेश)।पैडी ट्रांसप्लांटर (धान रोपने वाली मशीन) का उपयोग खेतों में धान की रोपाई के लिए किया जाता है स यह मशीन पौधों को सही दूरी और समान गहराई पर मिट्टी में लगाती है, जिससे मजदूरों की भारी बचत होती है और पैदावार में 10-20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की जाती है।
बालोद जिले में आधुनिक कृषि तकनीकों का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। पारंपरिक खेती के तरीकों में बदलाव की यह तस्वीर गुण्डरदेही विकासखंड के ग्राम पंचायत भरदाकला में साफ दिख रही है। यहां के सरपंच श्री क्रांति भूषण साहू ने अपने खेतों में पैडी ट्रांसप्लांटर यानी धान रोपने वाली मशीन का उपयोग शुरू कर क्षेत्र के किसानों के लिए नई राह दिखाई है।
लगभग 35 से 40 एकड़ भूमि पर खेती करने वाले श्री साहू ने इस वर्ष 10 से 12 एकड़ रकबे में पैडी ट्रांसप्लांटर के माध्यम से धान की रोपाई की। उनका कहना है कि पहले मजदूरों से रोपाई कराने में 20 से 25 दिन लग जाते थे। मशीन से यह काम बेहद कम समय में और ज्यादा सटीकता से हो गया।
मशीन से पौधे एक निश्चित दूरी और सीधी कतारों में रोपे जाते हैं। इससे फसल की बढ़वार बेहतर होती है और बाद में निंदाई-गुड़ाई में भी आसानी होती है। कृषि सीजन में मजदूरों की किल्लत एक बड़ी समस्या है। ऐसे में यह तकनीक किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है।
साहू के अनुसार नर्सरी के लिए ट्रे और अन्य संसाधनों पर शुरुआत में थोड़ा अतिरिक्त खर्च आता है, लेकिन बड़े पैमाने पर खेती के लिए यह तकनीक लंबे समय में काफी किफायती है। उन्होंने कहा, आने वाले समय में मजदूरों की समस्या और समय की कमी को देखते हुए खेती में मशीनीकरण ही एकमात्र विकल्प है। धान रोपाई के लिए पैडी ट्रांसप्लांटर सबसे बेहतरीन और लाभकारी तरीका है।
इस आधुनिक बदलाव से न सिर्फ किसानों की मेहनत कम हुई है, बल्कि समय पर रोपाई होने से पैदावार बढ़ने की भी उम्मीद है। कृषि विभाग के अधिकारियों के मार्गदर्शन में क्षेत्र के अन्य किसान भी अब इस तकनीक को समझकर अपनाने में रुचि दिखा रहे हैं।

 

 


परती जमीन बनी कमाई का जरिया, वैज्ञानिक खेती से किसान की आय में बड़ा इजाफा

10-Jul-2026
रायपुर(शोर संदेश)भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के क्लस्टर फ्रंट लाइन डेमॉन्स्ट्रेशन (सीएफएलडी) तिलहन कार्यक्रम के अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्र, बालोद द्वारा किसानों की आय बढ़ाने तथा परती भूमि के बेहतर उपयोग की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। बालोद जिले के ग्राम पुसावाड़ के प्रगतिशील किसान श्री भुवन लाल ने कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में परती भूमि पर तिल की उन्नत खेती कर न केवल लगभग दोगुना उत्पादन प्राप्त किया, बल्कि अपनी शुद्ध आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की।
पूर्व में भुवन लाल अपने खेत के एक हिस्से को परती छोड़ देते थे, जिससे भूमि का समुचित उपयोग नहीं हो पाता था। कृषि विज्ञान केंद्र बालोद के वैज्ञानिकों ने उन्हें परती भूमि में तिल की उन्नत किस्म ‘उन्नत रामा’ की खेती करने की सलाह दी और आधुनिक उत्पादन तकनीकों का प्रशिक्षण एवं सतत तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया। किसान ने वैज्ञानिक सलाह पर अमल करते हुए पहली बार वैज्ञानिक पद्धति से तिल की खेती शुरू की।
प्रदर्शन के दौरान किसान को सीड-कम-फर्टिलाइजर ड्रिल से कतारबद्ध बुवाई, ट्राइकोडर्मा एवं जैव उर्वरकों से बीज उपचार, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, समय पर खरपतवार नियंत्रण तथा रोग एवं कीटों के समेकित प्रबंधन की उन्नत तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। रोग नियंत्रण के लिए टेबुकोनाजोल एवं सल्फर तथा कीट नियंत्रण के लिए अनुशंसित मात्रा में प्रोफेनोफॉस का उपयोग कराया गया। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने बुवाई से लेकर कटाई तक नियमित रूप से खेत का निरीक्षण कर आवश्यक तकनीकी सलाह भी उपलब्ध कराई।
वैज्ञानिक पद्धति अपनाने का परिणाम अत्यंत सकारात्मक रहा। पारंपरिक खेती से जहां किसान को मात्र 2.40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त होता था, वहीं उन्नत तकनीकों के उपयोग से उपज बढ़कर 4.70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गई, जो 95.83 प्रतिशत अधिक है। इसी प्रकार किसान की शुद्ध आय 4 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 16,600 रुपये प्रति हेक्टेयर हो गई। लाभ-लागत अनुपात भी 1.38 से बढ़कर 2.43 तक पहुंच गया, जिससे कम लागत में अधिक उत्पादन और बेहतर लाभ की संभावना सिद्ध हुई।
किसान भुवन लाल ने बताया कि पहले उन्हें विश्वास नहीं था कि परती भूमि में तिल की खेती से इतना अच्छा लाभ मिल सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में आधुनिक तकनीकों को अपनाने के बाद उन्हें अपेक्षा से कहीं अधिक उत्पादन और आर्थिक लाभ मिला। उन्होंने कहा कि अब वे अधिक क्षेत्र में तिल की खेती करेंगे तथा आसपास के किसानों को भी वैज्ञानिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित करेंगे।
कृषि विज्ञान केंद्र बालोद के वैज्ञानिकों ने बताया कि जिले में खरीफ मौसम के दौरान बड़ी मात्रा में भूमि परती रह जाती है। यदि किसान ऐसी भूमि में तिल जैसी कम अवधि एवं कम पानी में सफल होने वाली तिलहनी फसलों की उन्नत किस्मों का वैज्ञानिक पद्धति से उत्पादन करें, तो उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। साथ ही तिलहन उत्पादन बढ़ने से खाद्य तेलों के क्षेत्र में देश की आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिलेगी।

पारंपरिक खेती छोड़ अपनाई नई तकनीक, खगपति की सालाना कमाई पहुंची डेढ़ लाख पार

10-Jul-2026
रायपुर(शोर संदेश)छत्तीसगढ के बस्तर जिले के विकासखंड लोहण्डीगुड़ा के ग्राम साडरा निवासी 47 वर्षीय किसान खगपति आज क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा बन गए हैं। कभी सिर्फ धान पर निर्भर और वर्षा आधारित खेती करने वाले खगपति ने कृषि विभाग के मार्गदर्शन और सरकारी योजनाओं का सहारा लेकर अपनी ढाई हेक्टेयर जमीन की तस्वीर ही बदल दी।
खगपति के पास पहले सिंचाई का कोई साधन नहीं था। वे केवल देशी तरीके से धान की खेती करता था स कम उत्पादन और ज्यादा लागत के कारण सालभर की आमदनी मुश्किल से 80 हजार 250 रुपये तक ही पहुंच पाती थी।
खगपति के जीवन में बदलाव की शुरुआत कृषि विभाग की मदद से हुई। उनके खेत में नलकूप खन और सोलर पंप लगाया गया, जिससे सिंचाई की समस्या दूर हुई। इसके साथ ही वे एक्सटेन्सन रिफॉर्म्स आत्मा योजना के तहत होने वाले प्रशिक्षण, भ्रमण और संगोष्ठियों से जुड़े। यहां उन्होंने फसल विविधीकरण, बेहतर प्रबंधन और आधुनिक कृषि के गुर सीखे।
पिछले 3 साल से उन्नत तरीके से खेती कर रहे खगपति की मेहनत रंग लाई। अब उनकी सालाना आय 1.5 लाख रुपये से ज्यादा हो गई है। यानी उनकी कमाई लगभग दोगुनी हो गई।
खगपति अब सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे गांव के लिए मिसाल हैं। वे अन्य किसानों को भी धान के साथ दूसरी फसलें लेने और नई तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
कृषि विभाग के उप संचालक ने भी किसानों से अपील की है कि वे कृषक उन्नति योजना का लाभ लें। इस योजना के तहत यदि कोई किसान पिछले साल के धान वाले खसरे में इस बार वैकल्पिक फसल लगाता है तो उसे 15 हजार रुपये प्रति एकड़ अतिरिक्त सहायता दी जाएगी। इच्छुक किसान अपने क्षेत्र के मैदानी कृषि अधिकारी या स्थानीय सहकारी समिति लेम्पस में जाकर पंजीयन करवा सकते हैं।
खगपति कहते हैं कि सही समय पर सही तकनीक और सरकारी योजना का लाभ लें तो खेती को भी मुनाफे का व्यवसाय बनाया जा सकता है।

 


मानसून में देरी की आशंका, कृषि विभाग ने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी

08-Jul-2026
रायपुर(शोर संदेश) अल-नीनो के संभावित प्रभाव को देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी करते हुए सतर्क रहने की अपील की है। विभाग ने चेतावनी दी है कि मानसून में देरी, लंबे अंतराल तक सूखे जैसी खंड वर्षा तथा बारिश का मौसम समय से पहले समाप्त होने की आशंका के कारण खरीफ फसलों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इससे निपटने के लिए राज्य में विशेष आकस्मिक कार्ययोजना लागू की है।
कृषि विभाग के अनुसार कार्ययोजना का उद्देश्य फसल विविधीकरण, कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा, जल संरक्षण और आधुनिक कृषि तकनीकों के माध्यम से सीमित संसाधनों में भी बेहतर उत्पादन सुनिश्चित करना है। किसानों को कम अवधि में तैयार होने वाली तथा कम पानी की आवश्यकता वाली धान की उन्नत किस्मों के चयन की सलाह दी गई है।
कृषि विभाग के अनुसार टिकरा और भर्री जैसी ऊंची एवं ढलान वाली भूमि में समय पर बुआई और नमी संरक्षण के लिए डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) पद्धति अपनाना लाभकारी रहेगा। किसानों से केवल धान पर निर्भर रहने के बजाय फसल विविधीकरण अपनाने की अपील की गई है। अरहर, मूंग, उड़द जैसी दलहनी तथा तिल, सोयाबीन और मूंगफली जैसी तिलहनी फसलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। खेतों में नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग (भूमि आच्छादन) तकनीक अपनाने, मेड़बंदी को मजबूत करने तथा वर्षा जल संरक्षण के स्थानीय और पारंपरिक उपायों को पुनर्जीवित करने की भी सलाह दी गई है। इससे वाष्पीकरण कम होगा और उपलब्ध नमी का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा।
कृषि विभाग ने किसानों से प्राकृतिक आपदा की स्थिति में आर्थिक नुकसान से बचाव के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत अनिवार्य रूप से पंजीयन कराने की अपील की है। खेती के दौरान किसी भी प्रकार की तकनीकी समस्या या मौसम संबंधी कठिनाई आने पर निकटतम कृषि विभाग के अधिकारियों से तत्काल संपर्क कर आवश्यक मार्गदर्शन लेने को कहा गया है।

 




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