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धान छोड़ मक्का अपनाया, किसानों ने बढ़ाई आय और रचा सफलता का नया अध्याय

05-Jun-2026
रायपुर (शोर संदेश)  फसल विविधीकरण को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि और भूमि की उर्वरता में सुधार हो रहा है। पारंपरिक फसलों से हटकर नई और उच्च-मूल्य वाली फसलें उगाने से किसानों को बाजार में बेहतर मूल्य मिलता है और जोखिम कम होता है। धान के बदले मक्का की खेती अपनाना फसल विविधीकरण की दिशा में एक बेहतरीन और अत्यधिक लाभदायक कदम है। इससे न केवल भूमि की उर्वरता और जल स्तर में सुधार होता है, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि होती है।
राजनांदगांव जिले में फसल चक्र परिवर्तन के तहत ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर मक्के की खेती अपनाने वाले किसानों को बेहतरीन आर्थिक लाभ प्राप्त हो रहा है। गौरमेड पॉपकॉर्न कंपनी के साथ अनुबंध खेती करने वाले किसानों ने उत्पादन एवं आय के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। कंपनी द्वारा जिले के किसानों से 5 करोड़ रूपए से अधिक मूल्य का पॉपकॉर्न मक्का खरीदा है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि हुई है।
रबी वर्ष 2025-26 में गौरमेड पॉपकॉर्न कंपनी द्वारा जिले के 605 किसानों के साथ अनुबंध कुल 1763 एकड़ क्षेत्र में पॉपकॉर्न मक्का की खेती कराई गई। किसानों को औसतन 19.33 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन प्राप्त हुआ। कंपनी ने 1700 रुपए प्रति क्विंटल की दर से मक्का की खरीदी करते हुए 5 करोड़ रूपए से अधिक मूल्य का मक्का खरीदा, इसमें से अब तक 3.73 करोड़ रूपए का भुगतान किसानों को किया जा चुका है तथा शेष भुगतान की प्रक्रिया निरंतर जारी है। 
छुरिया विकासखंड के ग्राम भरीटोला के किसान ललित कुमार साहू ने 23.56 एकड़ क्षेत्र में पॉपकॉर्न मक्का की खेती कर जिले में सर्वाधिक क्षेत्र में मक्का उत्पादन करने का गौरव प्राप्त किया। उन्हें इस खेती से 6 लाख 95 हजार रूपए से अधिक की आय हुई। इसी प्रकार राजनांदगांव विकासखंड के किसान वेद प्रकाश चंद्राकर ने 9.5 एकड़ क्षेत्र में पॉपकॉर्न मक्का की खेती कर 32.66 क्विंटल प्रति एकड़ का उत्कृष्ट उत्पादन प्राप्त किया। उन्हें इस खेती से 5 लाख 27 हजार रूपए से अधिक की आय हुई। वहीं ग्राम जमलेश्वर के किसान देवराम पटेल ने 35.5 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन प्राप्त कर लगभग 4 लाख 67 हजार रूपए की आमदनी अर्जित की। 
इन किसानों की सफलता अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन रही है। कृषि विभाग के अनुसार धान के स्थान पर मक्का जैसी वैकल्पिक फसलों को अपनाने से किसानों को अधिक लाभ मिलने के साथ-साथ जल संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता तथा फसल विविधीकरण को भी बढ़ावा मिल रहा है। जिले के किसानों की यह सफलता अन्य किसानों को भी फसल चक्र परिवर्तन अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।

किसानों को खाद की नहीं होगी कमी, खरीफ सीजन के लिए पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध

03-Jun-2026
रायपुर,( शोर संदेश  किसानों को खाद की नहीं होगी कमी, खरीफ सीजन के लिए पर्याप्त उर्वरक उपलब्धखरीफ सीजन 2026 के दौरान किसानों को समय पर गुणवत्तायुक्त खाद एवं बीज उपलब्ध कराने के लिए कृषि विभाग ने व्यापक तैयारियां की हैं। भारत सरकार एवं राज्य शासन के निर्देशानुसार जिले में उर्वरकों का पर्याप्त भंडारण सुनिश्चित किया गया है, जिससे किसानों को खेती-किसानी के दौरान किसी प्रकार की कमी का सामना न करना पड़े।
कृषि विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार जिले में खाद एवं बीज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। किसानों की सुविधा और कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए वैज्ञानिकों द्वारा अनुशंसित एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन प्रणाली को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैव उर्वरक, जैविक खाद, हरी खाद और अन्य वैकल्पिक उर्वरकों के उपयोग को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।
19 हजार मीट्रिक टन से अधिक उर्वरक लक्ष्य, 40 प्रतिशत भंडारण पूरा
जशपुर जिले को सहकारी क्षेत्र में 19,150 मीट्रिक टन उर्वरक उपलब्ध कराने का लक्ष्य मिला है। इसके विरुद्ध अब तक 7,756 मीट्रिक टन उर्वरकों का भंडारण किया जा चुका है, जो कुल लक्ष्य का लगभग 40 प्रतिशत है। इनमें से 1,186.12 मीट्रिक टन उर्वरकों का किसानों द्वारा उठाव किया जा चुका है, जबकि वर्तमान में 6,569.83 मीट्रिक टन उर्वरक उपलब्ध हैं।
कृषि विभाग का कहना है कि उपलब्ध भंडारण खरीफ सीजन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त है और किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराई जाएगी।
रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए जिले में नैनो उर्वरकों की भी पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। वर्तमान में 4,128 लीटर नैनो यूरिया एवं 3,468 लीटर नैनो डीएपी सहित कुल 7,596 लीटर नैनो उर्वरकों का भंडारण किया गया है। इनमें से 135 लीटर का वितरण किया जा चुका है, जबकि 7,463 लीटर नैनो उर्वरक उपलब्ध हैं।
किसानों को उनकी भूमि, फसल और वैज्ञानिक अनुशंसाओं के अनुरूप उर्वरकों का वितरण किया जा रहा है ताकि सभी किसानों को समान रूप से लाभ मिल सके।
मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और खेती की लागत कम करने के उद्देश्य से कृषि विभाग किसानों को हरी खाद एवं जैव उर्वरकों के उपयोग के लिए भी प्रोत्साहित कर रहा है। इच्छुक किसानों को प्रति एकड़ 8 किलोग्राम ढेंचा बीज एवं 4 किलोग्राम मूंग बीज उपलब्ध कराया जा रहा है।
इसके अलावा कृषि विज्ञान केंद्र डुमरबहार, शासकीय कृषि प्रक्षेत्र सुसडेगा एवं चयनित किसानों के खेतों में नील हरित काई (ब्लू ग्रीन एल्गी) का उत्पादन कराया जा रहा है। यह जैव उर्वरक वायुमंडलीय नत्रजन को स्थिर कर फसलों को प्राकृतिक पोषण प्रदान करता है तथा मिट्टी की गुणवत्ता एवं उर्वरता में वृद्धि करता है।
किसानों को गुणवत्तापूर्ण एवं उचित मूल्य पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए कृषि विभाग लगातार निगरानी कर रहा है। खरीफ वर्ष 2026 में अब तक जिले के 75 उर्वरक विक्रय केंद्रों का निरीक्षण किया जा चुका है। निरीक्षण के दौरान अनियमितता पाए जाने पर 38 विक्रय केंद्रों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं।
कृषि विभाग ने स्पष्ट किया है कि उर्वरकों के भंडारण, वितरण एवं विक्रय में किसी भी प्रकार की अनियमितता पाए जाने पर उर्वरक नियंत्रण आदेश 1985 तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के तहत संबंधित विक्रेताओं के विरुद्ध कठोर प्रशासनिक एवं कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे केवल अधिकृत विक्रेताओं से ही खाद एवं उर्वरक खरीदें तथा किसी भी प्रकार की शिकायत होने पर तत्काल कृषि विभाग को सूचित करें। कृषि विभाग की इस पहल से किसानों को समय पर गुणवत्तायुक्त उर्वरक उपलब्ध होंगे, खेती की लागत कम होगी, मिट्टी की उर्वरता संरक्षित रहेगी और खरीफ सीजन में बेहतर उत्पादन प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।
 

खरीफ सीजन से पहले मुंगेली में खाद-बीज की पर्याप्त व्यवस्था, किसानों को राहत

03-Jun-2026
रायपुर( शोर संदेश  मुंगेली जिले में खरीफ सीजन 2026 की शुरुआत के साथ ही जिले के किसानों को समय पर और पर्याप्त मात्रा में खाद एवं बीज उपलब्ध कराने के लिए जिला प्रशासन और कृषि विभाग पूरी सक्रियता के साथ कार्य कर रहे हैं। कलेक्टर कुन्दन कुमार के निर्देशानुसार जिले में रासायनिक उर्वरकों के भंडारण, वितरण और निगरानी की सुदृढ़ व्यवस्था सुनिश्चित की गई है, जिससे किसानों को खेती-किसानी के कार्यों में किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। जिले में वर्तमान में सहकारी, निजी एवं डबल लॉक केंद्रों सहित कुल 25 हजार मीट्रिक टन से अधिक रासायनिक उर्वरक उपलब्ध है। सहकारी क्षेत्र में अब तक 14 हजार 217 मीट्रिक टन से अधिक उर्वरकों का भंडारण किया गया है, जिसमें यूरिया, डीएपी, एनपीके, एसएसपी एवं म्यूरेट ऑफ पोटॉश शामिल हैं। वहीं निजी क्षेत्र में 10 हजार 727 मीट्रिक टन उर्वरक उपलब्ध कराया गया है। इसके अतिरिक्त डबल लॉक केंद्रों में 04 हजार 208 मीट्रिक टन तथा निजी थोक विक्रेताओं के पास 01 हजार 213 मीट्रिक टन उर्वरक सुरक्षित रूप से उपलब्ध है।
किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सेवा सहकारी समितियों के माध्यम से अब तक 05 हजार 668 मीट्रिक टन तथा निजी विक्रेताओं के माध्यम से 06 हजार 829 मीट्रिक टन रासायनिक उर्वरक का वितरण किया जा चुका है। इसके साथ ही जिले की 66 सहकारी समितियों में 12 हजार 412 क्विंटल बीज का भंडारण किया गया है, जिसमें मुख्य रूप से धान एवं अरहर के बीज शामिल हैं। निजी क्षेत्र के 200 से अधिक केंद्रों में भी लगभग 01 हजार 50 क्विंटल बीज उपलब्ध है। जिला प्रशासन ने किसानों से अपील की है कि जिले में रासायनिक उर्वरकों का पर्याप्त भंडारण उपलब्ध है तथा लगातार नई खेप भी पहुंच रही है। ऐसे में किसी भी प्रकार की अफवाहों या भ्रामक प्रचार पर ध्यान न दें और आवश्यकता अनुसार ही खाद का क्रय करें। प्रशासन किसानों को निर्बाध रूप से खाद एवं बीज उपलब्ध कराने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।








 

राष्ट्रीय बागवानी मिशन अंतर्गत धनिया की खेती से किसान रतिराम की बढ़ी आय

01-Jun-2026
रायपुर( शोर संदेश )। जिले के विकासखंड महासमुंद अंतर्गत ग्राम अछरीडीह के प्रगतिशील कृषक  रतिराम पटेल ने पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर उद्यानिकी फसलों को अपनाते हुए अपनी आय में अच्छी वृद्धि की है। कृषक पटेल बताते हैं कि पहले वे मुख्य रूप से धान की खेती करते थे, जिसमें अधिक लागत के बावजूद सीमित आय प्राप्त होती थी। बेहतर आमदनी और आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी प्राप्त करने के लिए उन्होंने उद्यानिकी विभाग से संपर्क किया और साग-सब्जी एवं मसाला फसलों की खेती की ओर कदम बढ़ाया।
वर्ष 2025-26 में पटेल ने राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत मसाला क्षेत्र विस्तार योजना से जुड़कर 0.87 हेक्टेयर क्षेत्र में धनिया फसल का उत्पादन किया। विभाग द्वारा उन्हें योजना के तहत 17,400 रुपये का अनुदान डीबीटी के माध्यम से सीधे बैंक खाते में प्रदान किया गया। उन्होंने खेती में ड्रिप सिंचाई एवं मल्चिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया, जिससे उत्पादन लागत में कमी आई और फसल की गुणवत्ता एवं उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
रतिराम पटेल बताते हैं कि पूर्व में धान की खेती से उन्हें कुल लाभ सीमित ही मिलता था। वहीं धनिया की खेती अपनाने के बाद उन्हें लगभग 35 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन प्राप्त हुआ। कम लागत और बेहतर उत्पादन के कारण उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा कुल लाभ लगभग 50,000 रुपए तक पहुंच गया। रतिराम पटेल की सफलता से प्रेरित होकर गांव के अन्य किसान तथा उनके रिश्तेदार भी उद्यानिकी फसलों एवं आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए उत्साहित हो रहे हैं।

 

नैनो यूरिया और नैनो डीएपी से कम लागत में ज्यादा उत्पादन, किसानों को मिल रहा बेहतर लाभ

01-Jun-2026
रायपुर( शोर संदेश  । नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का उपयोग खेती में लागत घटाने और पैदावार बढ़ाने के लिए सबसे आधुनिक तकनीक है। ये पारंपरिक खादों का एक अत्यधिक कुशल, पर्यावरण के अनुकूल और सस्ता विकल्प हैं, जो फसल के पोषण को सीधा पौधों तक पहुंचाते हैं। पारंपरिक खादों का बहुत बड़ा हिस्सा मिट्टी में बेकार चला जाता है। वहीं नैनो खाद पौधों को सीधा पोषण देते हैं, जिससे पोषक तत्वों का उपयोग 80 प्रतिशत से ज्यादा हो जाता है। रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है। नैनो उर्वरकों का संतुलित उपयोग मिट्टी में पोषक तत्वों के संतुलन को बनाए रखने में मदद कर सकता है।
कृषि के आधुनिक तकनीकों को अपनाकर किसान न केवल अपनी लागत कम कर रहे हैं, बल्कि बेहतर उत्पादन भी ले रहे हैं। ऐसा ही एक उदाहरण महासमुंद जिले के ग्राम कोसरंगी के प्रगतिशील किसान भूषण साहू ने पेश किया है। उन्होंने अपनी धान की फसल में पारंपरिक दानेदार खादों की निर्भरता को कम करते हुए नैनो डीएपी और नैनो यूरिया प्लस (तरल खाद) का सफल प्रयोग किया है, जिससे उनके पौधे अधिक स्वस्थ और फसल का विकास शानदार हुआ है। डिमास्ट्रेशन से मिला भरोसा, आधी हो गई दानेदार खाद की जरूरत किसान भूषण साहू ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि खरीफ 2024 में कृषि विभाग और इफको महासमुंद के क्षेत्रीय अधिकारियों ने उन्हें नैनो यूरिया के प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन) के लिए प्रोत्साहित किया था। 
शुरुआत में पारंपरिक खेती की तुलना में नैनो यूरिया वाले पौधे थोड़े कम हरे दिख रहे थे, लेकिन वे पूरी तरह स्वस्थ थे। जब फसल कटी और उत्पादन की तुलना की गई, तो दोनों का उत्पादन बिल्कुल बराबर था। इसके बाद रबी 2024 में मैंने नैनो डीएपी से बीजोपचार किया और फसल 30-35 दिन की होने पर 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से इसका छिड़काव किया। नतीजा यह रहा कि पारंपरिक दानेदार डीएपी की मात्रा 50 प्रतिशत आधी करने के बाद भी उत्पादन में कोई कमी नहीं आई। इस सफल प्रयोग के बाद से भूषण साहू नियमित रूप से तरल नैनो उर्वरकों का उपयोग कर रहे हैं और उन्होंने अपने खेतों में पारंपरिक दानेदार खादों की खपत को 30 प्रतिशत तक घटा दिया है। उनका कहना है कि यह तकनीक भविष्य की खेती के लिए बेहद लाभकारी है। यह कहना है महासमुंद के किसान भूषण साहू का। 
इस वर्ष खाद की सुचारू आपूर्ति बनाए रखने और किसानों की लागत घटाने के उद्देश्य से कृषि विभाग ने किसानों से अधिक से अधिक तरल खादों नैनो यूरिया प्लस एवं नैनो डीएपी का उपयोग करने की अपील की है। जिले में मांग और खपत को देखते हुए इस वर्ष एक बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया गया है। नैनो डीएपी (500 एम एल) 74 हजार बोतल का लक्ष्य, नैनो यूरिया 500 एम एल 30 हजार 250 बोतल का लक्ष्य रखा गया है।
कृषि विभाग के अनुसार किसानों की सुविधा के लिए विभाग द्वारा नैनो खादों के इस्तेमाल के सही तरीके व वैज्ञानिक विधि की जानकारी दी गई है। बीजोपचा- 1 किलोग्राम बीज में 5 एम एल नैनो डीएपी का घोल अच्छी तरह मिलाएं। मिलाने के बाद 20 मिनट तक छांव में सुखाएं, फिर बुवाई करें। थरहा/रोपा उपचार के लिए 1 लीटर पानी में 5 एम एल नैनो डीएपी मिलाकर घोल तैयार करें। रोपाई से पहले धान के थरहा (पौध) को 20 मिनट तक घोल में डुबोकर रखें। पहला छिड़काव फसल 30-35 दिन होने पर 1 लीटर पानी में 4-5 एम एल नैनो डीएपी और नैनो यूरिया प्लस मिलाएं। जब फसल में पत्तियां अच्छी तरह आ जाएं, तब स्प्रेयर से छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव फूल आने से ठीक पहले 1 लीटर पानी में 4-5 एम एल नैनो यूरिया प्लस का घोल बनाएं। पहले छिड़काव के 25-30 दिन बाद (पोटरी पानी के समय) पत्तियों पर छिड़कें। नैनो उर्वरकों को अधिकांश कीटनाशकों के साथ मिलाकर स्प्रे किया जा सकता है, लेकिन इन्हें कॉपर (तांबा) युक्त कीटनाशकों और फफूंदनाशकों के साथ बिल्कुल न मिलाएं।




 

 


धान की जगह औषधीय खेती से किसानों की आय में कई गुना बढ़ोतरी

28-May-2026
रायपुर, ( शोर संदेश छत्तीसगढ़ शासन के छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड की अभिनव पहल ‘पैडी डायवर्सन मॉडल’ किसानों के लिए आर्थिक समृद्धि का नया मार्ग प्रशस्त कर रही है। पारंपरिक धान की खेती में बढ़ती लागत और सीमित लाभ से जूझ रहे कृषकों के लिए यह योजना एक बेहद सफल और व्यावहारिक विकल्प बनकर उभरी है। इस मॉडल के अंतर्गत किसानों को धान के स्थान पर औषधीय पौधों वच और ब्राह्मी की खेती के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसके परिणामस्वरूप किसान अब कम लागत में अधिक आय अर्जित कर रहे हैं और ग्रामीण आत्मनिर्भरता की एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं।
बोर्ड की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत धमतरी, नारायणपुर, कोंडागांव, बस्तर और रायपुर जिले के 23 गांवों को शामिल किया गया है। इन जिलों के 147 किसानों ने कुल 65 एकड़ भूमि पर पारंपरिक खेती को छोड़कर औषधीय फसलें उगाने में सफलता हासिल की है। वच की खेती 63 किसानों द्वारा 39 एकड़ क्षेत्र में और ब्राह्मी का उत्पादन 84 किसानों द्वारा 26 एकड़ क्षेत्र में किया जा रहा है। यह अभूतपूर्व बदलाव उन क्षेत्रों में देखा जा रहा है, जहां पहले किसान केवल और केवल धान की खेती पर निर्भर थे।
इस योजना के क्रियान्वयन और सफलता में धमतरी जिला सबसे अग्रणी रहा है। धमतरी के 16 गांवों के 90 किसानों ने 27.50 एकड़ भूमि पर वच और ब्राह्मी की खेती कर रिकॉर्ड उत्पादन हासिल किया है। रायपुर जिले के 2 गांवों के 35 किसानों ने भी 11.50 एकड़ में औषधीय खेती अपनाकर शानदार लाभ अर्जित किया है। इसके अतिरिक्त नारायणपुर, कोंडागांव और बस्तर जैसे आदिवासी बहुल व सुदूर क्षेत्रों के किसानों ने भी इस मॉडल को अपनाकर अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
पैडी डायवर्सन मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता न्यूनतम निवेश में अधिकतम रिटर्न सुनिश्चित करना है। आंकड़े इसकी सफलता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। छत्तीसगढ़ शासन की यह दूरदर्शी पहल राज्य में औषधीय संपदा को सहेजने के साथ-साथ किसानों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में एक मील का पत्थर साबित हो रही है।
प्रति एकड़ खेती की कुल लागत लगभग 20 हजार एक वर्ष में ओर शुद्ध लाभ लगभग एक लाख रूपए। पारंपरिक धान की खेती की तुलना में औषधीय पौधों की इस जोड़ी वच और ब्राह्मी से किसानों को कई गुना अधिक शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है। 
छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड किसानों को केवल प्रोत्साहित ही नहीं कर रहा, बल्कि हर स्तर पर मजबूत तकनीकी और व्यावहारिक बैकअप दे रहा है।
किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले औषधीय पौधे पूरी तरह मुफ्त उपलब्ध कराए जाते हैं। किसानों वैज्ञानिक पद्धति से खेती करने के लिए विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। किसानों के आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए उन्हें सफल खेतों का एक्सपोजर विजिट कराया जाता है।  
बाजार की सुनिश्चितता
तैयार उत्पाद की शत-प्रतिशत खरीदी के लिए अनुबंधित संस्थाओं के माध्यम से पुख्ता व्यवस्था की गई है, जिससे किसानों को बिचौलियों से मुक्ति मिली है। आत्मनिर्भरता का नया अध्याय ‘पैडी डायवर्सन मॉडल’ ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही मार्गदर्शन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सुनिश्चित बाजार उपलब्ध हो, तो कृषि को बेहद मुनाफे का सौदा बनाया जा सकता है। आज इस योजना से जुड़े किसान न केवल खुद आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं, बल्कि अन्य पारंपरिक किसानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन रहे हैं।
 

 


खैराडीह के किसानों को मनरेगा की सौगात, 800 मीटर सिंचाई नाली से खेतों तक पहुंचा पानी

26-May-2026
रायपुर।  (शोर संदेश)  महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण और सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के प्रयास अब किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं। बलरामपुर जिले के विकासखण्ड शंकरगढ़ अंतर्गत ग्राम पंचायत खैराडीह में निर्मित पक्की सिंचाई नाली किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरी है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में मनरेगा के अंतर्गत लगभग 800 मीटर लंबी पक्की सिंचाई नाली का निर्माण कराया गया। इस पहल से गांव के किसानों को अब खेतों तक समय पर और नियमित रूप से पानी उपलब्ध हो रहा है। पहले किसान बारिश पर निर्भर होकर खेती करते थे तथा नहर का पानी खेतों तक पहुंचाने के लिए अस्थायी कच्ची नालियां बनानी पड़ती थीं। हर वर्ष बारिश और टूट-फूट के कारण इन नालियों को नुकसान पहुंचता था, जिससे किसानों की मेहनत और लागत दोनों बढ़ जाती थी।
ग्रामीणों की मांग पर निर्मित पक्की नाली ने अब इस समस्या का स्थायी समाधान कर दिया है। वर्तमान में इस नाली के माध्यम से लगभग 200 से 250 एकड़ कृषि भूमि में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो रही है, जिससे गांव के 11 किसान सीधे लाभान्वित हो रहे हैं। खेतों तक सुचारु रूप से पानी पहुंचने से फसल उत्पादन में वृद्धि हुई है और किसान अब खरीफ के साथ-साथ रबी सीजन में भी खेती कर पा रहे हैं।
किसानों का कहना है कि सिंचाई सुविधा बेहतर होने से खेती की लागत घटी है और उत्पादन बढ़ा है। इससे उनकी आय में वृद्धि होने के साथ आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई है। ग्रामीणों ने मनरेगा के तहत कराए गए इस कार्य को गांव के विकास और किसानों की समृद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।
जिले में मनरेगा के माध्यम से जल संरक्षण, सिंचाई विस्तार और ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास के ऐसे कार्य लगातार किए जा रहे हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है और किसानों का जीवन स्तर बेहतर हो रहा है।
 

 


राजनांदगांव का ग्राम घुपसाल बना मिसाल- कम पानी वाली फसलों से बढ़ा भू-जल स्तर, संकट से मिली मुक्ति

26-May-2026
रायपुर।  (शोर संदेश) छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के छुरिया विकासखंड स्थित ग्राम घुपसाल ने जल संरक्षण और टिकाऊ खेती (सस्टेनेबल फार्मिंग) की दिशा में पूरे प्रदेश के सामने एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया है। पारंपरिक और अधिक पानी की खपत वाली धान की फसल के चक्रव्यूह से बाहर निकलते हुए यहाँ के किसानों ने रबी सीजन में एक सामूहिक व ऐतिहासिक निर्णय लिया। किसानों ने धान के स्थान पर कम पानी में तैयार होने वाली मक्का, दलहन और तिलहन की फसलों को अपनाया, जिसके अत्यंत सकारात्मक परिणाम अब धरातल पर दिखाई देने लगे हैं। इस अभिनव पहल से न केवल ग्राम का भू-जल स्तर सुधरा है, बल्कि पेयजल और निस्तारी की पुरानी समस्या का भी स्थायी समाधान हो गया है।
ग्राम घुपसाल के इस सफल नवाचार की गूंज प्रशासनिक हलकों तक भी पहुँची। जिला कलेक्टर जितेन्द्र यादव ने स्वयं ग्राम घुपसाल का दौरा कर किसानों के इस अनूठे प्रयास का बारीकी से अवलोकन किया। उन्होंने खेतों में जाकर फसलों की स्थिति देखी और ग्रामीणों से सीधे संवाद कर खेती की नई पद्धतियों तथा उनके अनुभवों की जानकारी ली।
वर्तमान समय में पर्यावरण और जल संकट को देखते हुए कम पानी में अधिक और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन देने वाली फसलों को अपनाना समय की मांग है। इससे न केवल खेती की लागत (इनपुट कॉस्ट) कम होती है, बल्कि वैकल्पिक फसलों के बेहतर बाजार मूल्य से किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है। ग्राम घुपसाल का यह क्रॉप डायवर्सिफिकेशन (फसल विविधीकरण) मॉडल पूरे छत्तीसगढ़ के लिए एक अनुकरणीय मिसाल है।
ग्रामीणों ने अपने पुराने कड़वे अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि पूर्व में गर्मी का मौसम आते ही गांव में हाहाकार मच जाता था। मार्च का महीना बीतते-बीतते गांव के तालाब, हैंडपंप और बरसाती नाले पूरी तरह सूख जाते थे, जिससे पेयजल और मवेशियों के निस्तारी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाती थी। इस वर्ष गांव के किसानों ने एकजुट होकर 350 एकड़ से अधिक रकबे में धान की खेती पूरी तरह बंद कर दी और उसकी जगह कम पानी वाली फसलें लीं। इसका सीधा असर यह हुआ कि जमीन के भीतर का पानी सुरक्षित रहा और भू-जल स्तर ऊपर आ गया। ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक बताया कि जिन तालाबों में फागुन (मार्च) के बाद धूल उड़ती थी, वहाँ इस वर्ष अप्रैल के अंत में भी पर्याप्त पानी भरा हुआ है।
ग्राम घुपसाल की यह सफलता कहानी साबित करती है कि अगर नीतिगत समझ और जनभागीदारी का सही समन्वय हो, तो प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण बिना सरकारी दबाव के भी किया जा सकता है। यह गांव आज श्बदलते छत्तीसगढ़श् की जागरूक किसानी का एक जीवंत चेहरा बनकर उभरा है।

 

नाशपाती की खेती से बढ़ी किसानों की आमदनी, जशपुर बना फल उत्पादन का उभरता केंद्र

19-May-2026
रायपुर।  (शोर संदेश) मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ के किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ उद्यानिकी फसलों की ओर प्रोत्साहित किया जा रहा है। जशपुर जिले के किसान नाशपाती की खेती के माध्यम से उल्लेखनीय आय अर्जित कर आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। प्राकृतिक रूप से अनुकूल जलवायु और उद्यानिकी विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन के कारण जशपुर आज राज्य के प्रमुख नाशपाती उत्पादक जिलों में शामिल हो चुका है।
जशपुर की नाशपाती से बढ़ रही किसानों की आमदनी, 3,500 से अधिक कृषक जुड़े फल उत्पादन से
जशपुर जिले में लगभग 3,500 से अधिक किसान करीब 3,500 हेक्टेयर क्षेत्र में नाशपाती की खेती कर रहे हैं। जिले में प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख 75 हजार क्विंटल नाशपाती का उत्पादन हो रहा है। इससे हजारों कृषक परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और जिले की पहचान फल उत्पादन के क्षेत्र में लगातार मजबूत हो रही है।
जशपुर की नाशपाती स्वाद, गुणवत्ता और आकर्षक आकार के कारण देश के विभिन्न राज्यों में विशेष रूप से पसंद की जाती है। जिले के सन्ना, पंडरापाठ, कंवई, महुआ, सोनक्यारी, मनोरा, धवईपाई और गीधा जैसे क्षेत्रों से नाशपाती की खेप दिल्ली, उत्तर प्रदेश, ओडिशा सहित अन्य राज्यों में भेजी जाती है। फल को सावधानीपूर्वक कैरेट में पैक कर बाजारों तक पहुंचाया जाता है।
नाशपाती की खेती किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही है। एक एकड़ क्षेत्र से किसानों को औसतन 1 लाख से 1.50 लाख रुपए तक की वार्षिक आय प्राप्त हो रही है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है और किसान आधुनिक उद्यानिकी की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।
उद्यानिकी विभाग तथा नाबार्ड के सहयोग से किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण, पौधरोपण, बागवानी प्रबंधन और विपणन संबंधी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत नाशपाती क्षेत्र विस्तार योजना संचालित की जा रही है, जिसके माध्यम से किसानों को अनुदान एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल से जशपुर जिले में उद्यानिकी आधारित कृषि को नई दिशा मिली है। नाशपाती की खेती न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि जशपुर को राज्य के एक उभरते हुए फल उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित कर रही है।

धान से टमाटर तक की नई खेती ने बदली किस्मत

18-May-2026
रायपुर,।  (शोर संदेश) महासमुंद जिले के पिथौरा विकासखंड के बरनाईदादर गांव की किसान मीना पटेल ने आधुनिक खेती अपनाकर यह साबित कर दिया है कि नई तकनीक और सही मार्गदर्शन किसानों की आमदनी में बड़ा बदलाव ला सकता है। पारंपरिक धान खेती से सीमित आय पाने वाली मीना आज ग्राफ्टेड टमाटर की खेती से सालाना सात गुना अधिक मुनाफा कमा रही हैं।
करीब 4.13 हेक्टेयर सिंचित भूमि की मालिक मीना पहले केवल धान की खेती करती थीं। उद्यान विभाग की सलाह पर उन्होंने वर्ष 2025-26 में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत एक एकड़ में ग्राफ्टेड टमाटर की खेती शुरू की। ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग तकनीक के उपयोग से पानी की बचत हुई और उत्पादन भी बेहतर मिला। विभाग की ओर से उन्हें 30 हजार रुपये का अनुदान भी मिला।
मीना बताती हैं कि पहले धान से प्रति एकड़ लगभग 36 हजार रुपये की आय होती थी, लेकिन ग्राफ्टेड टमाटर से लागत निकालने के बाद करीब 2.80 लाख रुपये का शुद्ध लाभ हुआ। एक एकड़ में लगभग 400 क्विंटल उत्पादन लेकर उन्होंने टमाटर को पिथौरा और ओडिशा की मंडियों में बेचा, जहां बेहतर दाम मिले। मीना पटेल की सफलता अब आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बन गई है। क्षेत्र के कई किसान अब पारंपरिक खेती छोड़ उद्यानिकी फसलों और आधुनिक तकनीकों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।



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