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सुनो भाई उधो,अंधेर नगरी अउ चउपट राजा

01-Aug-2024
( शोर संदेश ) परमानंद वर्मा क्या अंधे की औलाद अंधे ही होते हैं, यदि हां तब तो कुछ नहीं कहना और जब नहीं होते हैं तब इस कहावत को अनावश्यक रूप से क्यों गढ़ा गया है? कुछ तो इसका अर्थ निश्चित होगा ही। कहते हैं कलियुग में इसकी प्रचुरता है। यहां सब अंधे हो गए हैं, गलत तो गलत है ही, लेकिन सत्य को भी गलत करार साबित करने में यहां के लोगों ने महारत हासिल कर ली है। जिधर देखो उधर अनैतिक, अधार्मिक, असामाजिक और गैर कानूनी कार्य हो रहे हैं लेकिन इसे मानने को कोई तैयार नहीं। आतंक, अधर्म, अन्याय और पाखंड जिंदाबाद है, और इससे डरकर सत्य छिप गया है निर्जन स्थल जंगल में कहीं जाकर। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख...
 

 



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