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धड़क उठा मासूमों का दिल- ‘प्रोजेक्ट धड़कन’ ने नारायणपुर के तीन नौनिहालों को दिया नया जीवन

17-Jul-2026
रायपुर: प्रोजेक्ट धड़कन छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा बच्चों के लिए चलाई जा रही एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य पहल है। इसके तहत 1 से 18 वर्ष तक के बच्चों में जन्मजात हृदय रोगों की पहचान कर, सत्य साई हॉस्पिटल जैसे विशिष्ट संस्थानों में उनका निःशुल्क उपचार (और सर्जरी) कराया जाता है।  ​छत्तीसगढ़ के दूरस्थ और वनांचल क्षेत्र नारायणपुर से आई एक बेहद सुखद और मानवीय संवेदनाओं से भरी खबर ने यह साबित कर दिया है कि अगर दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो स्वास्थ्य सुविधाएं समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक भी पहुंच सकती हैं। 
जिला प्रशासन नारायणपुर की अनूठी पहल ‘प्रोजेक्ट धड़कन’ और आरबीएसके (राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम) के साझा प्रयासों से आज तीन मासूम बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लौट आई है। जन्मजात हृदय रोग से जूझ रहे इन बच्चों को रायपुर के प्रतिष्ठित सत्य साईं हॉस्पिटल में नया जीवन मिला है, वह भी पूरी तरह निःशुल्क। ​अक्सर पहुंचविहीन और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में जागरूकता या संसाधनों की कमी के कारण बच्चों में जन्मजात हृदय रोग (Congenital Heart Disease) की पहचान समय पर नहीं हो पाती। 
इसी गंभीर चुनौती को देखते हुए नारायणपुर जिला प्रशासन ने 23 फरवरी 2026 को ‘प्रोजेक्ट धड़कन’ की शुरुआत की।  ​इसका मुख्य उद्देश्य जिले के कोने-कोने में जाकर बच्चों की स्वास्थ्य जांच करना और गंभीर हृदय रोग से पीड़ित बच्चों की पहचान कर उन्हें समय पर इलाज मुहैया कराना है। आरबीएसके की टीमों ने मैदानी स्तर पर उतरकर जिले के स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में सघन जांच अभियान चलाया। अभियान के तहत अब तक 6,224 बच्चों की प्रारंभिक स्वास्थ्य जांच की जा चुकी है।
जांच अभियान के दौरान टीम को तीन ऐसे मासूम मिले, जिनके दिल में गंभीर समस्या थी। समय रहते की गई इस पहचान ने इन बच्चों के लिए संजीवनी का काम किया।​ पारुल दुग्गा उम्र 1.5 वर्ष,​ नायशा उम्र 3 वर्ष और ​अनुष्का मंडावी उम्र 5 वर्ष ​इन तीनों बच्चियों की गंभीर स्थिति को देखते हुए आरबीएसके टीम ने त्वरित कार्रवाई की। प्राथमिक जांच और परामर्श के बाद इन्हें तत्काल सत्य साईं हॉस्पिटल, रायपुर रेफर किया गया। यहाँ विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने तीनों बच्चियों का सफल और पूर्णतः निःशुल्क हृदय ऑपरेशन किया। ऑपरेशन के बाद तीनों बच्चियां अब पूरी तरह स्वस्थ हैं। उनके माता-पिता की आंखों में अब आंसुओं की जगह अपने बच्चों के सुरक्षित भविष्य की खुशी और संतोष साफ देखा जा सकता है।
जिला स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, ‘प्रोजेक्ट धड़कन’ का यह अभियान थमा नहीं है। बच्चों की स्क्रीनिंग और नियमित जांच का काम लगातार जारी है ताकि भविष्य में भी किसी भी बच्चे को इलाज के अभाव में दम न तोड़ना पड़े। यह सफलता समय पर स्क्रीनिंग, सटीक रेफरल और संवेदनशील प्रशासन के बीच बेहतरीन तालमेल का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन ने सभी अभिभावकों से अपील की है कि वे अपने बच्चों की नियमित जांच जरूर कराएं। यदि बच्चों में खेलने या सामान्य गतिविधि के दौरान सांस फूलना,बहुत जल्दी थक जाना,उम्र के हिसाब से वजन न बढ़ना या कम बढ़ना और बार-बार बीमार पड़ना या सर्दी-खांसी होना लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करें।
 

 


सिम्स बिलासपुर में डॉक्टरों का कमाल, अन्ननली में फंसा सिक्का निकाला

17-Jul-2026
रायपुर( शोर संदेश ) छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स), बिलासपुर के कान, नाक एवं गला (ईएनटी) विभाग के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने तत्परता दिखाते हुए एक 6 वर्षीय मासूम की जान बचा ली है। बैगा जनजाति के इस बालक ने खेलते समय गलती से सिक्का निगल लिया था, जो उसकी आहार नली (अन्ननली) में फंस गया था। डॉक्टरों की टीम ने बेहद जटिल और आपातकालीन स्थिति में सफलतापूर्वक ऑपरेशन कर सिक्के को बाहर निकाला।
पेंड्रा से सिम्स बिलासपुर किया गया था रेफर
जानकारी के अनुसार, बिलासपुर जिले के कोटा तहसील अंतर्गत ग्राम सरगोंड का निवासी 6 वर्षीय बालक नरेंद्र खेलते समय सुबह करीब 7 बजे अचानक सिक्का निगल गया। इसके तुरंत बाद उसे कुछ भी निगलने में अत्यधिक परेशानी होने लगी। परिजन आनन-फानन में उसे पेंड्रा के एक निजी अस्पताल लेकर गए, जहां प्राथमिक उपचार के बाद बालक की गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे तत्काल सिम्स बिलासपुर रेफर कर दिया गया।
डॉक्टरों के समन्वित प्रयास से मिली सफलता
बालक को शाम करीब 6.30 बजे सिम्स लाया गया, जिसके बाद अस्पताल का पूरा अमला सक्रिय हो गया। रेडियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अर्चना सिंह ने तत्काल एक्स-रे कर अन्ननली के ऊपरी भाग (श्वासनली के मुहाने के ठीक पीछे) में फंसे सिक्के की सटीक लोकेशन की पहचान की। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष डॉ. मधुमिता मूर्ति की टीम ने बच्चे को सामान्य एनेस्थीसिया दिया। इसके बाद ईएनटी विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. आरती पाण्डेय एवं सहायक प्राध्यापक डॉ. श्वेता मित्तल के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने रिजिड इसोफैगोस्कोपी तकनीक के जरिए अत्यंत सावधानी से सिक्के को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। पूरी प्रक्रिया बिना किसी जटिलता के संपन्न हुई और ऑपरेशन के बाद बालक की स्थिति पूरी तरह सामान्य और संतोषजनक है।
विशेषज्ञ डॉक्टरों की दक्षता का परिणाम
इस सफल उपचार पर सिम्स के अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि रेडियोलॉजी, एनेस्थीसिया और ईएनटी विभाग के विशेषज्ञ डॉक्टरों की दक्षता, आधुनिक तकनीकों और आपसी तालमेल के कारण ही इस जटिल आपातकालीन मामले को समय पर सुलझाया जा सका। सिम्स का लक्ष्य हर मरीज को सुरक्षित और भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवाएं देना है।
चिकित्सा अधीक्षक और डॉक्टरों ने अभिभावकों के लिए जारी की सलाह
चिकित्सा अधीक्षक डॉ. लखन सिंह ने आगाह किया कि छोटे बच्चों द्वारा सिक्का, बटन, बैटरी या चुंबक जैसी चीजें निगलना एक गंभीर आपात स्थिति है। ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार के घरेलू नुस्खे अपनाने के बजाय सीधे विशेषज्ञ अस्पताल पहुंचना चाहिए। ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. आरती पाण्डेय ने अभिभावकों से अपील की है कि वे बच्चों की पहुंच से सिक्के, छोटी बैटरी और छोटे खिलौने दूर रखें। यदि बच्चा कोई वस्तु निगल लेता है और उसे लार टपकने, गले में दर्द या सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण दिखें, तो बिना समय गंवाए तुरंत डॉक्टरों से संपर्क करें।
 

 


राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की बड़ी उपलब्धि : जिला अस्पतालों में बढ़ी जटिल ऑपरेशन की क्षमता

15-Jul-2026
रायपुर, 15 जुलाई 2026 छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं के विकेंद्रीकरण और जिला अस्पतालों को आधुनिक चिकित्सा सेवाओं से सशक्त बनाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। सूरजपुर जिला चिकित्सालय ने सफलतापूर्वक 6 टोटल हिप रिप्लेसमेंट (टीएचआर) ऑपरेशन कर यह साबित किया है कि अब जटिल अस्थि शल्य चिकित्सा जैसी अत्याधुनिक सेवाएं भी जिला स्तर पर उपलब्ध हो रही हैं।
इस उपलब्धि से न केवल सूरजपुर बल्कि आसपास के जिलों के मरीजों को भी राहत मिलेगी। अब उन्हें महंगे इलाज के लिए रायपुर या अन्य बड़े शहरों की ओर रुख नहीं करना पड़ेगा। इससे मरीजों का समय, धन और अनावश्यक परेशानी तीनों की बचत होगी।
सीएमएचओ डॉ. कपिल देव पैकरा और सिविल सर्जन डॉ. अजय मरकाम के नेतृत्व में अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ. अजय साहू एवं डॉ. अमन गुप्ता ने इन जटिल शल्यक्रियाओं को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. विकास भगत और डॉ. अनिल कुमार ने भी ऑपरेशन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस उपलब्धि में नर्सिंग एवं ऑपरेशन थिएटर की पूरी टीम का भी उल्लेखनीय योगदान रहा। समर्पित टीमवर्क और आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था के कारण सभी ऑपरेशन सफल रहे।
ऑपरेशन के बाद सभी मरीज स्वस्थ हैं और चिकित्सकीय निगरानी में तेजी से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर रहे हैं। यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि राज्य सरकार द्वारा जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों, आधुनिक उपकरणों और बेहतर स्वास्थ्य अधोसंरचना पर किए जा रहे निवेश का सकारात्मक परिणाम अब आम नागरिकों तक पहुंच रहा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जिला अस्पतालों में टीएचआर जैसी जटिल शल्य चिकित्सा की उपलब्धता से विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर, ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के मरीजों को सबसे अधिक लाभ मिलेगा। इससे गंभीर अस्थि रोगों के उपचार की पहुंच बढ़ेगी और स्वास्थ्य सेवाओं पर लोगों का विश्वास भी मजबूत होगा।
सीएमएचओ डॉ. कपिल देव पैकरा ने पूरी चिकित्सा टीम, नर्सिंग स्टाफ एवं सहयोगी कर्मचारियों को बधाई देते हुए कहा कि भविष्य में भी जिला चिकित्सालय सूरजपुर में आधुनिक एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का लगातार विस्तार किया जाएगा, ताकि प्रदेश के नागरिकों को अपने जिले में ही बेहतर और विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध हो सके।
 

दूरस्थ बस्तर तक पहुंचीं बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, डब्ल्यूएचओ ने सराहा अभियान

14-Jul-2026
रायपुर  (शोर संदेश)बीजापुर जिले के अति-संवेदनशील डोडीतुमनार (तुमनार) क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार और सुदूरवर्ती ग्रामीणों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए नियमित रूप से शिविर आयोजित किए जाते हैं। बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा जैसे पूर्व के नक्सल-प्रभावित बस्तर क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए दिल्ली और राज्य स्तरीय अधिकारी समय-समय पर दौरा करते है। इन क्षेत्रों में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा तकनीकी विशेषज्ञता प्रदान की जाती है ताकि प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल और कुपोषण जैसी समस्याओं का समाधान किया जा सके।
मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बस्तर अभियान (एमएसबीए) के तहत बीजापुर जिले के विकासखंड बीजापुर स्थित दूरस्थ ग्राम डोडीतुमनार में आयोजित स्वास्थ्य शिविर का निरीक्षण राज्य स्तरीय दल और दिल्ली से आई विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की टीम ने किया। टीम ने शिविर में दी जा रही स्वास्थ्य सेवाओं का अवलोकन करते हुए दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के प्रयासों की सराहना की।
निरीक्षण के दौरान डब्ल्यूएचओ टीम ने ग्राम डोडीतुमनार के निवासी सोमलू मड़ियाम और उनके परिवार से मुलाकात की। मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बस्तर अभियान के तहत हुई स्क्रीनिंग में उनके बच्चे में नेफ्रोटिक सिंड्रोम की समय रहते पहचान हुई थी। इसके बाद विशेषज्ञ चिकित्सकों की देखरेख, नियमित उपचार और फॉलो-अप से बच्चे के स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार आया। टीम ने इसे समय पर जांच और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।
स्वास्थ्य शिविर में 116 ग्रामीणों का स्वास्थ्य परीक्षण और उपचार किया गया। शिविर में मलेरिया जांच, बुखार, सर्दी-खांसी, दर्द, खुजली, उल्टी-दस्त जैसी सामान्य बीमारियों का उपचार किया गया। इसके साथ ही बच्चों का नियमित टीकाकरण, आवश्यक दवाइयों का वितरण, स्वास्थ्य परामर्श और अन्य चिकित्सा सेवाएं भी उपलब्ध कराई गईं।
डब्ल्यूएचओ टीम ने मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बस्तर अभियान की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के प्रयास दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों में समय पर बीमारी की पहचान, उपचार और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह अभियान ग्रामीणों को उनके गांव के पास ही विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में प्रभावी पहल साबित हो रहा है।
स्वास्थ्य शिविर के दौरान मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, जिला कार्यक्रम प्रबंधक, जिला टीकाकरण अधिकारी, विकासखंड कार्यक्रम प्रबंधक, ब्लॉक विस्तार प्रशिक्षण अधिकारी, सेक्टर सुपरवाइजर, चिकित्सा अधिकारी, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी, ग्रामीण स्वास्थ्य अधिकारी, एएनएम, मितानिन तथा स्वास्थ्य विभाग के अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।


 

 


गादीरास मेगा मेडिकल कैंप में 447 ग्रामीणों को मिली विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएं

13-Jul-2026
रायपुर (शोर संदेश)।ग्रामीण और सुदूर इलाकों में आयोजित होने वाले निःशुल्क मेगा मेडिकल कैंप (Mega Medical Camps) आर्थिक रूप से कमजोर और दूरदराज के मरीजों के लिए एक वरदान साबित होते हैं l  ये शिविर गाँव के दरवाजे तक उच्च-स्तरीय चिकित्सा, विशेषज्ञ परामर्श, मुफ्त दवाइयाँ और गंभीर बीमारियों की प्रारंभिक जाँच सीधे पहुँचाकर ग्रामीणों को बड़ी राहत देते हैं l
सुदूर वनांचल के सुकमा जिले के दूरस्थ ग्राम पंचायत गादीरास में जिला प्रशासन की पहल से आयोजित निःशुल्क मेगा मेडिकल कैंप ग्रामीणों के लिए बड़ी राहत साबित हुआ। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सशक्त नेतृत्व और जिले के प्रभारी मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में कलेक्टर अमित कुमार की विशेष पहल पर आयोजित इस शिविर में 447 ग्रामीणों को विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाएं और निःशुल्क स्वास्थ्य जांच का लाभ मिला।
शिविर में आंध्र प्रदेश के ग्रेट ईस्टर्न मेडिकल स्कूल एंड हॉस्पिटल, रागोलू-श्रीकाकुलम के विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने जिला स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर मरीजों की जांच और उपचार किया। मेडिसिन, जनरल सर्जरी, बाल रोग और हड्डी रोग विशेषज्ञों ने प्रत्येक मरीज का परीक्षण कर आवश्यक सलाह दी।
मेडिकल कैंप में सभी मरीजों को निःशुल्क दवाइयां उपलब्ध कराई गईं। साथ ही ब्लड प्रेशर, शुगर, ईसीजी और 2डी-ईको जैसी महत्वपूर्ण जांचें भी बिना किसी शुल्क के की गईं। इससे दूरस्थ क्षेत्र के लोगों को बेहतर इलाज के साथ आर्थिक राहत भी मिली।
जांच के दौरान गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीजों को आगे के उपचार के लिए उच्च स्वास्थ्य संस्थानों में रेफर किया गया। इनमें 12 अस्थि रोग, 10 शिशु रोग और 27 जनरल सर्जरी के मरीज शामिल हैं। जिला प्रशासन ने इन मरीजों के आवागमन के लिए निःशुल्क बस सुविधा भी उपलब्ध कराई, ताकि इलाज में किसी प्रकार की परेशानी न हो।
शिविर के दौरान पात्र हितग्राहियों को शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी दिया गया। कुल 62 आयुष्मान कार्ड और 10 वय वंदन कार्ड वितरित किए गए, जिससे जरूरतमंद परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा का लाभ मिलेगा।
गादीरास में आयोजित यह निःशुल्क मेगा मेडिकल कैंप इस बात का उदाहरण है कि जिला प्रशासन स्वास्थ्य सेवाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाएं, निःशुल्क जांच, दवाइयां, रेफरल सुविधा और जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ एक ही स्थान पर मिलने से ग्रामीणों में खुशी और विश्वास दोनों बढ़े हैं। यह पहल दूरस्थ क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की दिशा में एक सफल और प्रेरणादायक उदाहरण बन गई है।
 

घर-घर स्वास्थ्य जांच, मलेरिया और डेंगू पर प्रहार, बस्तर में तेज हुआ अभियान

10-Jul-2026
रायपुर।  (शोर संदेश) मुख्यमंत्री स्वस्थ बस्तर अभियान छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा बस्तर संभाग के सभी जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं को सुदूर गांवों तक पहुंचाने के लिए शुरू किया गया एक व्यापक मेगा हेल्थ ड्राइव है। इस अभियान के तहत गांव-गांव और घर-घर जाकर हर नागरिक की मुफ्त स्वास्थ्य जांच की जा रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सुशासन और जनस्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की नीति के अनुरूप बस्तर जिले में "स्वच्छ एवं स्वस्थ बस्तर अभियान" के तहत मलेरिया मुक्त बस्तर के लक्ष्य को साकार करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने व्यापक स्तर पर अभियान तेज कर दिया है। कलेक्टर आकाश छिकारा के मार्गदर्शन में जिले के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में मलेरिया, डेंगू तथा अन्य मौसमी बीमारियों की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य विभाग की टीमें लगातार सक्रिय हैं।
अभियान के तहत स्वास्थ्य अमला घर-घर पहुंचकर बुखार से पीड़ित लोगों की पहचान कर उनकी जांच कर रहा है। आवश्यकतानुसार मलेरिया और डेंगू की स्क्रीनिंग के साथ त्वरित उपचार की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जा रही है। संभावित प्रभावित क्षेत्रों में लार्वा सर्वे, मच्छरों के प्रजनन स्थलों का नष्टिकरण, फॉगिंग तथा दवाओं के छिड़काव जैसे प्रभावी उपाय लगातार किए जा रहे हैं, जिससे संक्रमण फैलने की आशंका को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।
स्वास्थ्य विभाग द्वारा जनजागरूकता को भी अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। स्वास्थ्य कार्यकर्ता लोगों को घरों और आसपास साफ-सफाई बनाए रखने, पानी का जमाव रोकने, मच्छरदानी का नियमित उपयोग करने तथा बुखार या अन्य संदिग्ध लक्षण दिखाई देने पर स्वयं उपचार करने के बजाय तत्काल निकटतम स्वास्थ्य केंद्र में जांच कराने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
अभियान को जनआंदोलन का स्वरूप देने के लिए स्वास्थ्य विभाग के साथ पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, नगरीय निकायों तथा अन्य संबंधित विभागों के समन्वय से व्यापक स्वच्छता गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। मच्छरों के प्रजनन स्थलों को समाप्त करने और स्वच्छ वातावरण सुनिश्चित करने के लिए सामूहिक प्रयास किए जा रहे हैं।
जिला प्रशासन ने नागरिकों से अपील की है कि वे स्वच्छता को अपनी दैनिक आदत बनाएं, घरों एवं आसपास पानी जमा न होने दें तथा किसी भी प्रकार के बुखार या संदिग्ध लक्षण होने पर तुरंत स्वास्थ्य केंद्र पहुंचकर जांच कराएं। प्रशासन का विश्वास है कि जनसहभागिता और सतत जागरूकता के माध्यम से मलेरिया मुक्त, स्वच्छ और स्वस्थ बस्तर के लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकेगा।

जीने की उम्मीद छोड़ चुके थे माता-पिता, डॉक्टरों ने 50 दिन की जंग लड़कर बचाई मासूम की जिंदगी

26-Jun-2026
रायपुर(शोर संदेश) छत्तीसगढ़ के चिकित्सकों ने एक बार फिर सेवा और समर्पण की मिसाल पेश की है। रायगढ़ मेडिकल कालेज के बाल्य एवं शिशु रोग विभाग की नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई (NICU) की टीम ने जूटमिल, रायगढ़ निवासी ललित एवं सुगंधी के समयपूर्व जन्मे गंभीर रूप से बीमार नवजात को 50 दिनों के सफल उपचार के बाद स्वस्थ अवस्था में उनके माता-पिता को सौंपा। 
गर्भावस्था के 33वें सप्ताह में जन्मा यह शिशु मात्र 1.7 किलोग्राम वजन का था। जन्म लेते ही शिशु को गंभीर श्वसन संबंधी समस्या हुई और पहले ही दिन से बार-बार दौरे पड़ने लगे। जांच में फेफड़ों में रक्तस्राव, गंभीर संक्रमण सेप्सिस एवं निमोनिया जैसी जटिलताएं पाई गईं। शिशु की हालत इतनी नाजुक थी कि उसे तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। 
उपचार के दौरान शिशु को कई बार रक्त एवं प्लाज्मा चढ़ाया गया। व्यापक एंटीबायोटिक एवं एंटीफंगल दवाओं से संक्रमण पर काबू पाया गया। स्थिति में सुधार होने पर वेंटिलेटर से हटाकर नॉन-इनवेसिव वेंटिलेशन NIV पर लाया गया। भर्ती के दौरान हुए कोलेस्टेटिक पीलिया का भी सफल उपचार किया गया।
डॉ.एल .के.सोनी ने बताया कि उपचार के दौरान एक समय शिशु की स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि माता-पिता उम्मीद छोड़कर अस्पताल आना बंद कर चुके थे। इसके बावजूद NICU टीम ने हार नहीं मानी और शिशु का उपचार निरंतर जारी रखा। टीम के प्रयासों से शिशु ने धीरे-धीरे दूध लेना शुरू किया, वजन बढ़ा और सामान्य गतिविधियां विकसित हुईं।छुट्टी के समय शिशु पूरी तरह स्थिर था, दौरे-मुक्त ,सामान्य वातावरण में पर्याप्त ऑक्सीजन स्तर बनाए हुए था । 
डॉ. लक्ष्मणेश्वर कुमार सोनी ,विभागाध्यक्ष बाल्य एवं शिशु रोग के नेतृत्व में डॉ. गौरव क्लॉडियस सहायक प्राध्यापक , वरिष्ठ रेसिडेंट डॉ. फारूज अहमद, डॉ. पल्लवी एवं समस्त नर्सिंग व पैरामेडिकल स्टाफ ने 23दिन वेंटिलेटर  और 17दिन ऑक्सीजन सपोर्ट में रहे शिशु को पूरे 50 दिनों तक दिन-रात निगरानी कर उपचार किया और एक नन्ही जिंदगी को बचाया ।
अस्पताल अधीक्षक डॉ. दुर्गा शंकर पटेल ने कहा कि यह सफलता हमारे चिकित्सकों ,नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ के समर्पण का परिणाम है। मरीज की जान बचाना हमारी प्राथमिकता है। कठिन से कठिन केस में भी हम पूरी निष्ठा से उपचार करते हैं। इस उपचार में लगे रक्त, प्लाज्मा और अन्य सुविधाओं का पूरा खर्च अस्पताल प्रबंधन ने वहन किया l वही निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च 6-7लाख रुपए आता हैं । जो हमारे यहाँ पूर्णतः निःशुल्क इलाज हुआ।
इस सफलता पर अधिष्ठाता डॉ. संतोष कुमार ने NICU टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि चिकित्सकों के समर्पण, सतत निगरानी, उत्कृष्ट चिकित्सकीय कौशल एवं उत्कृष्ट टीमवर्क का परिणाम है l जिसने एक नन्हे जीवन को नई शुरुआत दी है l
 

 


देश में दवाओं की गुणवत्ता पर कड़ी निगरानी, मई में 159 दवा नमूने मानक पर खरे नहीं उतरे

23-Jun-2026
नई दिल्ली।   (शोर संदेश) देश में दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन यानी सीडीएससीओ लगातार निगरानी अभियान चला रहा है। इसी क्रम में मई 2026 के लिए जारी मासिक गुणवत्ता जांच रिपोर्ट में कुल 159 दवा नमूनों को “नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी” यानी मानक गुणवत्ता से कम पाया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय औषधि प्रयोगशालाओं ने 46 दवा नमूनों को और विभिन्न राज्यों की औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं ने 113 दवा नमूनों को गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं पाया।
किसी दवा को एनएसक्यू घोषित किए जाने का अर्थ यह है कि परीक्षण के दौरान वह निर्धारित गुणवत्ता मानकों के एक या अधिक मानकों पर खरी नहीं उतरी। हालांकि, सीडीएससीओ ने स्पष्ट किया है कि यह निष्कर्ष केवल जांच किए गए विशेष बैचों तक सीमित है। इससे बाजार में उपलब्ध उसी दवा के अन्य बैचों या उत्पादों की गुणवत्ता पर कोई सामान्य निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए।
मई 2026 की रिपोर्ट में असम से एक नकली यानी स्प्यूरियस दवा का मामला भी सामने आया है। जांच में पाया गया कि एक अनधिकृत निर्माता ने किसी अन्य कंपनी के स्वामित्व वाले ब्रांड नाम का उपयोग कर इस दवा का निर्माण किया था। मामले की जांच जारी है और दोषियों के खिलाफ औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम तथा नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
सीडीएससीओ ने कहा है कि राज्य औषधि नियामकों के सहयोग से ऐसी दवाओं की नियमित पहचान की जाती है, ताकि उन्हें बाजार से हटाया जा सके और आम जनता को सुरक्षित तथा गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराई जा सकें।
 

विशेष आलेख : ​छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा क्षेत्र में 'PM-USHA' की महा-क्रांति

22-Jun-2026
रायपुर, (शोर संदेश)।  छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा जगत में एक नए युग का सूत्रपात हो चुका है। वर्ष 2014 से 2026 के बीच केंद्र सरकार से मिली प्रमुख स्वीकृतियों और सौगातों की शृंखला में 'प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान' (PM-USHA) राज्य के लिए वरदान साबित हो रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के प्रभावी क्रियान्वयन, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की नैशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन काउंसिल (NAAC) ग्रेडिंग में सुधार, और अनुसंधान (Research) के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढांचे के विकास के लिए केंद्र सरकार द्वारा भारी-भरकम वित्तीय अनुदान की स्वीकृति दी गई है। यह योजना पूर्ववर्ती राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA) का ही एक परिष्कृत और अधिक उन्नत रूप है।
इस योजना के तहत देश भर के लिए कुल 12,926.10 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। इस विशाल बजट का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा छत्तीसगढ़ के हिस्से आया है। ​योजना के तहत छत्तीसगढ़ राज्य में चयनित पात्र शासकीय विश्वविद्यालयों को मल्टी-डिसिप्लिनरी एजुकेशन एंड रिसर्च यूनिवर्सिटीज़ (MERU) के अंतर्गत प्रति संस्थान 20 करोड़ से लेकर 100 करोड़ रुपए तक का भारी-भरकम अनुदान मिल रहा है। वहीं, चिन्हित शासकीय महाविद्यालयों को बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण (Grants to Strengthen Colleges) के लिए 5 करोड़ रुपए तक का प्रोजेक्ट-बेस्ड अनुदान स्वीकृत किया जा रहा है। इस वित्तीय भार का वहन केंद्र और राज्य सरकार द्वारा 60:40 के अनुपात (60% केंद्रांश और 40% राज्यांश) में किया जा रहा है।
​छत्तीसगढ़ में यह योजना केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर तेजी से प्रगति कर रही है। छत्तीसगढ़ शासन के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा केंद्र सरकार के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) निष्पादित किया जा चुका है। वर्तमान में, चयनित कॉलेजों द्वारा विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कर पोर्टल पर अपलोड की जा रही है। इसके साथ ही, राज्य के शिक्षण संस्थानों में स्मार्ट क्लासरूम, आधुनिक लैब, और कंप्यूटर सेंटर जैसे अत्याधुनिक अधोसंरचना निर्माण का कार्य युद्धस्तर पर जारी है।
PM-USHA योजना का सबसे खूबसूरत पहलू इसका समावेशी होना है। इस परियोजना का लाभ छत्तीसगढ़ के समस्त 33 जिलों को मिल रहा है। योजना के तहत विशेष रूप से राज्य के ​आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों और दूरस्थ अंचलों जैसे बस्तर संभाग और सरगुजा संभाग,​कम सकल नामांकन अनुपात (GER) वाले क्षेत्रों,​आकांक्षी जिलों जैसे धमतरी, गरियाबंद, महासमुंद आदि के शासकीय कॉलेजों को प्राथमिकता के आधार पर शामिल किया गया है, ताकि विकास की दौड़ में पीछे छूटे क्षेत्रों को मुख्यधारा में लाया जा सके।
​इस दूरदर्शी परियोजना से राज्य के विभिन्न शासकीय शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत लगभग 5 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं सीधे लाभान्वित हो रहे हैं। इस योजना का सबसे बड़ा फायदा ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों, अनुसूचित जनजाति (ST), अनुसूचित जाति (SC) और महिला वर्ग के छात्र-छात्राओं को मिल रहा है। अब छत्तीसगढ़ के वनांचलों और दूरदराज के गांवों के युवाओं को भी वैश्विक स्तर की आधुनिक शिक्षा और अनुसंधान की सुविधाएं अपने ही राज्य में सुलभ हो रही हैं, जो उनके सुनहरे भविष्य की मजबूत नींव रख रही हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का बड़ा फैसला, 16 एफडीसी दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण पर तत्काल रोक

21-Jun-2026
नई दिल्ली।  (शोर संदेश) केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने बड़ा फैसला लेते हुए 16 फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (एफडीसी) दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। मंत्रालय ने इस संबंध में औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 की धारा 26ए के तहत अधिसूचना जारी करते हुए कहा कि यह आदेश तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है।
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद लिया गया है, जिसमें देश में उपलब्ध फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (एफडीसी) दवाओं की समीक्षा करने को कहा गया था। इन निर्देशों के अनुपालन में ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (डीटीएबी) ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। समिति का उद्देश्य विभिन्न एफडीसी दवाओं की जांच कर ऐसी दवाओं की पहचान करना था, जो अवैज्ञानिक, चिकित्सकीय रूप से अनुचित या मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण हो सकती हैं।
मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि वैज्ञानिक मूल्यांकन और विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर 16 एफडीसी दवाओं के खिलाफ कार्रवाई की गई है। जांच में इन दवाओं का चिकित्सीय औचित्य नहीं पाया गया और यह निष्कर्ष निकला कि संभावित जोखिमों की तुलना में इनके उपयोग से मिलने वाला लाभ पर्याप्त नहीं है।
प्रतिबंधित एफडीसी दवाएं विभिन्न चिकित्सीय श्रेणियों से संबंधित हैं। इनमें कुछ त्वचा रोगों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाएं, दर्द निवारक एवं ऐंठनरोधी दवाएं तथा एंटीबायोटिक आधारित दवाएं शामिल हैं।
मंत्रालय ने कहा कि यह कदम सरकार के उन निरंतर प्रयासों का हिस्सा है, जिनका उद्देश्य जनता को केवल सुरक्षित, प्रभावी और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित दवाएं उपलब्ध कराना है। इससे पहले भी विस्तृत वैज्ञानिक समीक्षा के बाद कई एफडीसी दवाओं पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। यह मरीजों की सुरक्षा और साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
बयान में कहा गया कि 16 एफडीसी दवाओं के निर्माण (बिक्री के लिए), बिक्री, वितरण और आपूर्ति पर पूरे देश में तत्काल प्रभाव से रोक लागू रहेगी। सभी राज्य औषधि नियंत्रकों, नियामक प्राधिकरणों और प्रवर्तन एजेंसियों को अधिसूचना का सख्ती से पालन और प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
मंत्रालय ने दवा निर्माताओं, आयातकों, वितरकों और अन्य हितधारकों को भी कानून के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करने तथा आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने की सलाह दी है।
 



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