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बार-बार संक्रमण और थकान हो सकते हैं एप्लास्टिक एनीमिया के संकेत

10-Mar-2026
नई दिल्ली। ( शोर संदेश ) एप्लास्टिक एनीमिया एक दुर्लभ और गंभीर ब्लड डिसऑर्डर है, जिसमें बोन मैरो पर्याप्त मात्रा में रेड ब्लड सेल्स, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स का निर्माण नहीं कर पाता। भारत में हर साल कई लोगों की मृत्यु एप्लास्टिक एनीमिया के कारण होती है। कई मरीजों में इसका सही कारण पता नहीं चल पाता, लेकिन यह स्थिति ऑटोइम्यून डिसऑर्डर्स, वायरल इंफेक्शन्स और कुछ टॉक्सिक सब्सटेंसेस, केमिकल्स और रेडिएशन के कॉन्टैक्ट से जुड़ी हो सकती है।
वी.पी. कृष्णन, कंसल्टेंट, पीडियाट्रिक हीमेटो-ऑन्कोलॉजी एवं बीएमटी, के अनुसार बोन मैरो शरीर का ब्लड सेल बनाने वाला मुख्य केंद्र होता है। जब यह केंद्र धीमा पड़ जाता है या काम करना बंद कर देता है, तो इसके परिणाम जानलेवा हो सकते हैं। मरीज बार-बार इंफेक्शन, अत्यधिक थकान और अनकंट्रोल्ड ब्लीडिंग के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। हालांकि एप्लास्टिक एनीमिया एक गंभीर डिसऑर्डर है, लेकिन इसके प्रभावी इलाज उपलब्ध हैं। कई योग्य मरीजों के लिए ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट एक संभावित इलाज और जीवन का दूसरा अवसर दे सकता है।
भारतीय आंकड़े बताते हैं कि बोन मैरो फेल्योर सिंड्रोम में एप्लास्टिक एनीमिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कई मरीज डॉक्टर के पास तब पहुंचते हैं जब लैबोरेटरी रिपोर्ट में पैनसाइटोपेनिया पाया जाता है, यानी शरीर में रेड ब्लड सेल्स, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स की कमी। इंडियन जर्नल ऑफ हेमेटोलॉजी एंड ब्लड ट्रांसफ्यूजन में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि भारत में बोन मैरो फेल्योर के मामलों का बड़ा हिस्सा एप्लास्टिक एनीमिया के कारण होता है।
रिकॉर्ड के अनुसार, भारत में मरीज पश्चिमी देशों की तुलना में कम उम्र में ही बीमारी के लक्षण दिखाने लगते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि जागरूकता और समय पर पहचान कितनी आवश्यक है।
(स्रोत: https://link.springer.com/journal/12288)
एप्लास्टिक एनीमिया में क्या होता है?
एक सामान्य शरीर में बोन मैरो लगातार रेड ब्लड सेल्स बनाता है, जो शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाते हैं; व्हाइट ब्लड सेल्स, जो इंफेक्शन्स से लड़ते हैं; और प्लेटलेट्स, जो ब्लीडिंग रोकते हैं। एप्लास्टिक एनीमिया में यह निर्माण प्रक्रिया रुक जाती है। अधिकतर मामलों में इम्यून सिस्टम ब्लड बनाने वाली स्टेम सेल्स पर हमला कर उन्हें नष्ट कर देता है, जो रक्त के सभी कंपोनेंट्स के निर्माण के लिए जिम्मेदार होती हैं।
जैसे-जैसे ब्लड सेल्स की संख्या घटती है, लक्षण दिखाई देने लगते हैं। हीमोग्लोबिन कम होने से लगातार थकान, कमजोरी, हल्का काम करने पर भी सांस फूलना और पीलापन दिखाई देता है। व्हाइट ब्लड सेल्स की कमी से मरीज बार-बार या गंभीर इंफेक्शन के शिकार हो जाते हैं। प्लेटलेट्स कम होने से आसानी से चोट लगना, मसूड़ों या नाक से ब्लीडिंग होना, छोटे कट पर भी देर तक ब्लीडिंग रहना और त्वचा पर नीले निशान पड़ना जैसे लक्षण दिखते हैं।
डॉक्टर हीमोग्लोबिन, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स की कमी की इस स्थिति को पैनसाइटोपेनिया कहते हैं। समय पर कम्प्लीट ब्लड काउंट और आवश्यकता होने पर बोन मैरो जांच कर सही डायग्नोसिस और ट्रीटमेंट शुरू करना बहुत जरूरी है।
(स्रोत: https://www.nhlbi.nih.gov/health/aplastic-anemia)
क्या इसका उपचार संभव है?
हाँ। इलाज का चुनाव बीमारी की गंभीरता, मरीज की उम्र और उसकी हेल्थ कंडीशन पर निर्भर करता है। कुछ मामलों में इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं से बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे ब्लड सेल्स की संख्या बढ़ सकती है। लेकिन कई मरीजों, खासकर गंभीर रूप से प्रभावित युवाओं के लिए, ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट सबसे प्रभावी और आशाजनक ट्रीटमेंट हो सकता है।
ट्रांसप्लांट की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि डोनर का एचएलए प्रोफाइल मरीज से कितना मैच करता है। डॉक्टर 10/10 एचएलए मैच की तलाश करते हैं, जिससे कॉम्प्लिकेशन्स कम हों और रिजल्ट बेहतर मिलें। दुर्भाग्य से, परिवार में उपयुक्त मैच केवल लगभग 30 प्रतिशत मरीजों को ही मिल पाता है। बाकी 70 प्रतिशत मरीज नेशनल या इंटरनेशनल रजिस्ट्रियों में दर्ज अनरिलेटेड डोनर्स पर निर्भर रहते हैं।
भारत में रजिस्टर्ड ब्लड स्टेम सेल डोनर्स की संख्या अभी कम है जिसके कारण मरीजों के लिए ट्रांसप्लांट तक पहुंच काफी सीमित हो जाती है।
गलत जानकारी डोनर रजिस्ट्रेशन में बड़ी बाधा है। दर्द, लंबे समय तक हेल्थ पर असर या फर्टिलिटी पर प्रभाव जैसी गलत धारणाएं लोगों को हतोत्साहित करती हैं। वास्तव में, ब्लड स्टेम सेल डोनेशन एक सुरक्षित और वॉलंटरी प्रक्रिया है और ज्यादातर मामलों में प्लेटलेट्स डोनेशन के समान होती है।
एप्लास्टिक एनीमिया के मैनेजमेंट के लिए सरकारी सपोर्ट, डोनर रजिस्ट्रेशन कैंपेन और डोनर पूल बढ़ाने की आवश्यकता है। बार-बार इंफेक्शन, अत्यधिक थकान, बिना कारण ब्लीडिंग और नीले निशान जैसे लक्षणों की समय पर पहचान से जल्दी डायग्नोसिस और रेफरल संभव है। साथ ही, डोनर बेस मजबूत करने से पूरे भारत में हजारों मरीजों को जीवनदान दिया जा सकता है।


 

नारायणपुर के सुदूर गांवों में पहुंच रही हैं स्वास्थ्य सेवाएं : 107 ग्रामीणों को मिला उपचार

07-Mar-2026
रायपुर( शोर संदेश )  नारायणपुर जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए ग्राम पंचायत घमंडी के आश्रित ग्राम जटवर में सुशासन एक्सप्रेस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान लगाए गए विशेष स्वास्थ्य जांच शिविर में बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने पहुंचकर स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाया।
शिविर में ग्राम पंचायत घमंडी के अंतर्गत आने वाले जटवर, घमंडी, कोगालीं, ओरछापार, कारकाबेड़ा, हिकोनार, गोडेलेमाका और वाडापेंदा जैसे गांवों के ग्रामीण शामिल हुए। दो दिनों तक चले इस शिविर में कुल 107 मरीजों का उपचार किया गया और उन्हें आवश्यक दवाइयों के साथ स्वास्थ्य संबंधी परामर्श भी दिया गया।
स्वास्थ्य जांच के दौरान 84 लोगों की मलेरिया जांच की गई, जिनमें 15 मरीज पॉजिटिव पाए गए। इसके अलावा टीबी स्क्रीनिंग, रक्तचाप, शुगर, हीमोग्लोबिन और नेत्र जांच भी की गई। गर्भवती महिलाओं की विशेष एएनसी जांच कर उन्हें आवश्यक सलाह दी गई, जिससे मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
शिविर में मौसमी बीमारियों जैसे सर्दी-खांसी, बुखार, खुजली, दस्त, कमजोरी और दर्द से पीड़ित मरीजों को भी उपचार और आवश्यक दवाइयां प्रदान की गईं। साथ ही ग्रामीणों को विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी दी गई और उन्हें अधिक से अधिक लाभ लेने के लिए प्रेरित किया गया। इस अवसर पर 80 ग्रामीणों को प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत जन आरोग्य योजना के तहत् आयुष्मान कार्ड भी वितरित किए गए।
इस स्वास्थ्य शिविर में 10 सदस्यीय स्वास्थ्य टीम ने सेवाएं दीं, जिसमें डॉ. बृजनंदन बनपुरिया, राजीव सिंह, डॉ. हेमेंद्र जुरी, प्रदीप देवांगन, सूरज साहू, रामनाथ उसेंडी, जयसिंह मांझी, नकुल पोटाई, कमलेश कुमार नाग और कु. चंद्रिका गोटा शामिल थे। शिविर का संचालन उप स्वास्थ्य केंद्र वाडापेंदा के माध्यम से किया गया।
दो दिवसीय सुशासन एक्सप्रेस कार्यक्रम के सफल आयोजन से ग्रामीणों को अपने ही क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हुईं। इससे न केवल लोगों को समय पर उपचार मिला, बल्कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी बढ़ी। यह पहल दूरस्थ गांवों तक शासन की सेवाएं पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।

 

होली त्योहार पर अम्बेडकर अस्पताल में 24 घंटे जारी रहेगी इमरजेंसी सेवा

03-Mar-2026
रायपुर( शोर संदेश )  होली त्योहार के मद्देनज़र अम्बेडकर अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए अस्पताल अधीक्षक डॉ. संतोष सोनकर ने चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ तथा पैरामेडिकल स्टाफ सहित सभी विभागों को आवश्यक निर्देश जारी किए हैं।
होली के दौरान संभावित दुर्घटनाओं एवं आपात स्थितियों को ध्यान में रखते हुए अधीक्षक डॉ. सोनकर द्वारा आपातकालीन सेवाओं के निर्बाध संचालन के विशेष निर्देश दिए गए हैं।
होली त्योहार के दिन 4 मार्च को शासकीय अवकाश होने के कारण अस्पताल में बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) का संचालन नहीं होगा। हालांकि, इमरजेंसी सेवा पूर्व की भांति 24 घंटे निरंतर जारी रहेगी। आपात चिकित्सा विभाग में आने वाले मरीजों को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए सभी वार्डों में जीवन रक्षक दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा समस्त मेडिकल स्टाफ को अलर्ट मोड में रहने के निर्देश दिए गए हैं।
त्योहार को देखते हुए अस्पताल परिसर की सुरक्षा व्यवस्था को भी सुदृढ़ किया गया है।आवश्यकतानुसार मरीजों को डीकेएस अस्पताल स्थित सुपर स्पेश्यलिटी विभाग में रेफर किए जाने के लिए अम्बेडकर अस्पताल से डीकेएस अस्पताल तक एम्बुलेंस परिवहन सेवा उपलब्ध रहेगी।
अस्पताल प्रबंधन ने सभी लोगों से सुरक्षित एवं सावधानीपूर्वक होली मनाने की अपील की है तथा किसी भी प्रकार की मेडिकल इमरजेंसी की स्थिति में अम्बेडकर अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में आकर उपचार प्राप्त करने को कहा है।
 

 


बालोद जिला चिकित्सालय में जांघ की हड्डी का सफल ऑपरेशन, बुजुर्ग मरीज को राहत

01-Mar-2026
बालोद ( शोर संदेश )। जिला चिकित्सालय बालोद के अस्थि रोग विशेषज्ञों द्वारा अस्पताल में भर्ती बालोद विकासखण्ड के ग्राम खपरी निवासी 56 वर्षीय मरीज  रामकली बाई के जांघ की हड्डी का शुक्रवार 27 फरवरी को सफलतापूर्वक आपरेशन किया गया। उल्लेखनीय है कि मरीज श्रीमती रामकली बाई की जांघ की दांया हड्डी टूट जाने के कारण उनके परिजनों ने 23 फरवरी को जिला चिकित्सालय बालोद में भर्ती किया था। मुख्य अस्पताल अधीक्षक  आरके श्रीमाली के निर्देशानुसार अस्पताल के अस्थि रोग विशेषज्ञों के द्वारा गहन जांच के उपरांत 27 फरवरी को रामकली बाई के दांए जाघ की हड्डी का सफलतापूर्वक आॅपरेशन किया गया। जिला चिकित्सालय बालोद के चिकित्सकों के द्वारा समय पर चिकित्सीय सुविधा उपलब्ध कराकर सफलतापूर्वक आपरेशन किए जाने से मरीज रामकली को तत्काल राहत मिला है। विदित हो कि मुख्य अस्पताल अधीक्षक  आरके श्रीमाली के निर्देशानुसार जिला चिकित्सालय बालोद के अस्थि रोग विशेषज्ञ डाॅ. पंकज सोरी, सर्जरी विशेष डाॅ. एनके साहू एवं निश्चिेतता विशेषज्ञ डा. अविनाश मण्डावी द्वारा बुजुर्ग मरीज रामकली बाई का सफलतापूर्वक आपरेशन किया गया। रामकली बाई के आपरेशन के कार्य में ओटी स्टाफ एस देवदास, एसनेताम, शिरिन, कुमारी पूर्णिमा,पिंकी,  चैतराम, भगवती, कोमल आदि कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

 


स्वास्थ्य केंद्रों के समय पालन और इलाज में लापरवाही पर सख्त निर्देश

28-Feb-2026
कोरबा ( शोर संदेश ) । कलेक्टोरेट सभाकक्ष में कलेक्टर  कुणाल दुदावत की अध्यक्षता में स्वास्थ्य विभाग की मासिक समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक में कलेक्टर ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों, मलेरिया, कुष्ठ, सिकलसेल स्क्रीनिंग, आयुष्मान कार्ड, आभा आईडी, एचआरपी (उच्च जोखिम गर्भवती), मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण, परिवार कल्याण, एनसीडी, एनक्यूएएस, आरबीएसके, एनआरसी तथा अन्य महत्वपूर्ण विषयों की विस्तृत समीक्षा की। कलेक्टर ने निर्देशित किया कि सभी स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों की जांच और उपचार समय पर सुनिश्चित हों, अस्पताल समय पर खुलें तथा सभी चिकित्सकीय स्टाफ की उपस्थिति अनिवार्य रूप से दर्ज हो।
टीबी नियंत्रण की समीक्षा के दौरान कलेक्टर  दुदावत ने ने संदिग्ध मरीजों की जांच और उपचार में तेजी लाने के निर्देश दिए। उन्होंने जांच किट की कमी होने पर शासन को तत्काल पत्र भेजने के लिए सीएमएचओ को निर्देशित किया। सैंपल लेकर समय पर नोटिफिकेशन जारी करने तथा डीबीटी भुगतान के मामलों में सुधार लाने के निर्देश दिए गए। एक्स-रे जांच की संख्या कम होने पर कलेक्टर ने नाराज़गी व्यक्त करते हुए वनरेबल आबादी की शत-प्रतिशत एक्स-रे जांच सुनिश्चित करने और अप्रैल माह के अंत तक एक्स-रे जांच में 20 प्रतिशत वृद्धि करने के निर्देश दिए।
आभा आईडी और आयुष्मान कार्ड निर्माण की प्रगति की समीक्षा करते हुए कलेक्टर ने स्पष्ट किया कि मितानिन और स्वास्थ्य विभाग की टीमें घर-घर जाकर वंचित परिवारों की आभा आईडी बनाएं, ताकि मार्च माह तक 90 प्रतिशत परिवारों का लक्ष्य पूरा किया जा सके। मातृ स्वास्थ्य समीक्षा में एएनसी में पंजीकरण के बाद संस्थागत प्रसव में अंतर तथा एचआई एमएस पोर्टल में एंट्री कम होने पर कलेक्टर ने नाराज़गी व्यक्त की और तुरंत सुधार करने के निर्देश दिए। नियमित टीकाकरण की समीक्षा में यू-विन पोर्टल में कम एंट्री पर कलेक्टर ने संबंधित बीएमओ और बीपीएम को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए।
एनआरसी की समीक्षा के दौरान कलेक्टर ने कहा कि एनआरसी में शत-प्रतिशत ऑक्यूपेंसी सुनिश्चित हो तथा भर्ती हितग्राहियों को समय पर भुगतान दिया जाए। मातृ एवं शिशु मृत्यु के मामलों की समीक्षा करते हुए उन्होंने निर्देशित किया कि स्वास्थ्य विभाग अलर्ट मोड पर रहते हुए त्वरित उपचार सुनिश्चित करे, ताकि ऐसे मामलों पर पूर्णतः रोक लगाई जा सके। मुख स्वास्थ्य कार्यक्रम (डेंटल) के अंतर्गत सर्जरी की संख्या में वृद्धि के निर्देश भी दिए गए। एनसीडी कार्यक्रम में स्वास्थ्य विभाग को शिविर आयोजित कर व्यापक जांच कराने के निर्देश प्रदान किए गए। कलेक्टर ने मातृ-शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के लिए प्रभावी कदम उठाने, संबंधित कर्मचारियों का प्रशिक्षण कराने तथा प्रभावित परिवारों को परामर्श उपलब्ध कराने पर भी बल दिया।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्री-बर्थ वेटिंग रूम स्थापित करने के निर्देश देते हुए कलेक्टर ने नोडल अधिकारी नियुक्त करने और उनके मोबाइल नंबर सार्वजनिक करने को कहा। प्रधानमंत्री राहत दुर्घटना सहायता राशि और नए भवनों को एनक्यूएएस प्रमाणन के लिए तैयार करने के निर्देश भी बैठक में दिए गए।
कलेक्टर ने भवनविहीन स्वास्थ्य केंद्रों के लिए भवन निर्माण, जर्जर भवनों की मरम्मत, सीपेज की समस्या वाले भवनों की छत सुधार, बाउंड्रीवॉल, बोरवेल, बड़े परिसर वाले स्वास्थ्य संस्थानों में हाई-मास्ट लाइट की स्थापना, आवश्यक उपकरण, मैनपावर और अन्य अधोसंरचना संबंधी प्रस्तावों को तत्काल प्रस्तुत करने के निर्देश दिए, ताकि परीक्षण उपरांत स्वास्थ्य व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके।
बैठक में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, जिला स्वास्थ्य अधिकारी, जिला टीबी एवं कुष्ठ अधिकारी, जिला टीकाकरण अधिकारी, जिला कार्यक्रम प्रबंधक, आरएमएनसीएचए, शहरी कार्यक्रम प्रबंधक, समस्त नोडल अधिकारी, सभी खंड चिकित्सा अधिकारी, विकासखंड कार्यक्रम प्रबंधक और स्वास्थ्य विभाग के अन्य अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित थे।
 

पीएम जनमन योजना से पीवीटीजी बस्तियों तक पहुंच रही स्वास्थ्य सेवाएं

28-Feb-2026
बलरामपुर । ( शोर संदेश ) दूरस्थ वनांचल और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में बसे विशेष पिछड़ी जनजाति समुदाय के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाभियान (पीएम जनमन) के अंतर्गत संचालित मोबाइल मेडिकल यूनिट से बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित की जा रही है।
बलरामपुर रामानुजगंज जिले में विशेष रूप से पिछड़ी जनजातियों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से चार मोबाइल मेडिकल यूनिट संचालित की जा रही हैं। इन यूनिटों के माध्यम से विकासखण्ड बलरामपुर, राजपुर, कुसमी और शंकरगढ़ के सुदूर पहाड़ी कोरवा बाहुल्य क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं सीधे गांव और बसाहटों तक पहुंचाई जा रही हैं। अब ग्रामीणों को प्राथमिक उपचार के लिए कई किलोमीटर दूर स्वास्थ्य केंद्रों की ओर नहीं जाना पड़ता, बल्कि स्वास्थ्य सेवाएं स्वयं उनके घर के समीप पहुंच रही हैं। मोबाइल मेडिकल यूनिट में चिकित्सक, नर्सिंग स्टाफ, लैब टेक्नीशियन तथा आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। साथ ही सामान्य स्वास्थ्य जांच के साथ रक्तचाप, शुगर, हीमोग्लोबिन जैसे आवश्यक लैब टेस्ट किए जाते हैं। जरूरत पड़ने पर मरीजों को आगे के उपचार के लिए उच्च स्वास्थ्य केंद्रों में रेफर भी किया जा रहा है। गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच, बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण तथा बुजुर्गों की देखभाल पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
स्वास्थ्य विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक 235 बसाहटों में 87 स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए जा चुके हैं। इन शिविरों में कुल 3,678 हितग्राहियों को स्वास्थ्य सेवाओं से लाभान्वित किया गया है। मोबाइल मेडिकल यूनिट के माध्यम से विशेष पिछड़ी जनजाति समुदाय में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी बढ़ रही है। पहले जहां ग्रामीण सामान्य बुखार या संक्रमण को नजरअंदाज कर देते थे या बैगा गुनिया का सहारा लेते थे, लेकिन अब वे नियमित जांच और परामर्श के महत्व को समझने लगे हैं। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ने से विशेष पिछड़ी जनजाति समुदाय में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।
गौरतलब है कि जिले में कलेक्टर राजेन्द्र कटारा के निर्देशन तथा जिला पंचायत सीईओ नयनतारा सिंह तोमर के मार्गदर्शन में मोबाइल मेडिकल यूनिट का सुव्यवस्थित संचालन किया जा रहा है। नियमित मॉनिटरिंग, तय रूट चार्ट और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से बसाहटों में स्वास्थ्य सेवायें सुनिश्चित की जा रही है। पीएम जनमन के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार निश्चित ही विशेष पिछड़ी जनजातियों के जीवन स्तर में दीर्घकालिक सकारात्मक परिवर्तन लाने की दिशा में सशक्त प्रयास सिद्ध हो रहा है।

रायगढ़ मेडिकल कॉलेज में शुरू हुई अत्याधुनिक घुटना व कूल्हा प्रत्यारोपण सर्जरी सुविधा

20-Feb-2026
रायपुर ।  ( शोर संदेश )  रायगढ़ मेडिकल कॉलेज से संबद्ध संत बाबा गुरु घासीदास जी स्मृति शासकीय चिकित्सालय के अस्थि रोग विभाग में अब घुटना प्रत्यारोपण एवं कूल्हा प्रत्यारोपण जैसी जटिल सर्जरी की सुविधा सफलतापूर्वक शुरू कर दी गई है। अब तक जिन मरीजों को ऐसे ऑपरेशन के लिए बड़े शहरों का रुख करना पड़ता था और लाखों रुपये खर्च करने पड़ते थे, उन्हें अपने ही जिले में विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में अत्याधुनिक तकनीक से सुरक्षित उपचार मिल रहा है।
इस उपलब्धि के पीछे राज्य सरकार के स्वास्थ्य क्षेत्र को सुदृढ़ करने के निरंतर प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय  के नेतृत्व में स्वास्थ्य अधोसंरचना को मजबूत करने की दिशा में लगातार कार्य किया जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल एवं वित्त मंत्री  ओ.पी. चौधरी के मार्गदर्शन में रायगढ़ मेडिकल कॉलेज में अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार तेजी से हो रहा है।
अधिष्ठाता डॉ. संतोष कुमार एवं अस्पताल अधीक्षक डॉ. मनोज कुमार मिंज के नेतृत्व में यह नई सुविधा प्रारंभ की गई है, जिससे जिलेवासियों को उच्चस्तरीय उपचार अपने ही शहर में उपलब्ध हो रहा है। अधिष्ठाता डॉ. संतोष कुमार ने बताया कि निजी अस्पतालों में प्रति जोड़ प्रत्यारोपण सर्जरी पर लगभग 2.5 से 3 लाख रुपये तक का खर्च आता है, जबकि शासकीय मेडिकल कॉलेज रायगढ़ में यह सुविधा उपलब्ध होने से मरीजों को आयुष्मान योजना के अंतर्गत निःशुल्क एवं उच्चस्तरीय उपचार मिल रहा है। इससे न केवल आर्थिक बोझ कम हो रहा है, बल्कि जिले के लोगों को अपने ही शहर में बेहतर स्वास्थ्य सुविधा का लाभ भी मिल रहा है।
28 वर्षीय मरीज छविराज कुमार ने बताया कि उन्हें लंबे समय से पैर में गंभीर दिक्कत थी, जिसके कारण चलने-फिरने में काफी परेशानी होती थी। उन्होंने पहले निजी अस्पताल में परामर्श लिया था, जहां सर्जरी के लिए लगभग ढाई लाख रुपये का खर्च बताया गया। आर्थिक रूप से यह उनके लिए काफी कठिन था।
उन्होंने कहा कि रायगढ़ मेडिकल कॉलेज अस्पताल में आयुष्मान योजना के तहत सर्जरी की सुविधा शुरू होने की जानकारी मिलने पर उन्होंने यहां उपचार कराया। सफल ऑपरेशन के बाद अब उनके पैर में कोई परेशानी नहीं है। उन्होंने बताया कि ऑपरेशन के दूसरे दिन से ही वे चलने लगे थे और अब वे पूरी तरह सहज और आत्मविश्वास के साथ चल-फिर पा रहे हैं। छविराज ने चिकित्सकों की टीम और अस्पताल प्रबंधन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें निःशुल्क और उच्चस्तरीय उपचार मिलने से उनके जीवन में बड़ा सकारात्मक बदलाव आया है।
अस्थि रोग विभागाध्यक्ष डॉ. प्रवीण जांगड़े ने बताया कि गठिया, ऑस्टियोआर्थराइटिस, रूमेटॉइड आर्थराइटिस, दुर्घटना के बाद जोड़ों की क्षति अथवा लंबे समय से घुटने और कूल्हे के असहनीय दर्द से पीड़ित मरीजों के लिए जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी अत्यंत प्रभावी उपचार है। उन्होंने बताया कि सर्जरी के बाद मरीजों के दर्द में उल्लेखनीय कमी आती है और वे तेजी से सामान्य जीवन की ओर लौटते हैं। चलने-फिरने की क्षमता में सुधार होने से मरीजों की जीवन गुणवत्ता में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। डॉ. जांगड़े ने आमजन से अपील की है कि घुटने या कूल्हे की पुरानी समस्या को नजरअंदाज न करें और समय रहते अस्थि रोग विभाग की ओपीडी में विशेषज्ञ चिकित्सकों से परामर्श लेकर उचित उपचार कराएं।
अस्पताल अधीक्षक डॉ. एम.के. मिंज ने बताया कि अस्पताल में घुटना एवं कूल्हा प्रत्यारोपण की सुविधा अत्याधुनिक तकनीक और निर्धारित चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के तहत उपलब्ध है। अस्थि रोग विभागाध्यक्ष डॉ. प्रवीण जांगड़े एवं एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष डॉ. ए.एम. लकड़ा की विशेषज्ञ टीम द्वारा इन सर्जरी को पूर्ण सुरक्षा और दक्षता के साथ किया जा रहा है। विगत कुछ दिनों में लगभग 10 मरीजों की सफलतापूर्वक सर्जरी की गई है, जिसमें 5 कूल्हा और 5 घुटना प्रत्यारोपण शामिल हैं।
 

निरंतर डायलिसिस सेवाओं से किडनी मरीजों को राहत, निःशुल्क योजना बनी संबल

20-Feb-2026
रायपुर,( शोर संदेश )प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के सकारात्मक परिणाम अब ग्रामीण अंचलों में भी दिखाई देने लगे हैं। विशेष रूप से किडनी रोग से जूझ रहे मरीजों के लिए संचालित निःशुल्क डायलिसिस सुविधा उपचार का महत्वपूर्ण आधार बनकर उभर रही है। इससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के मरीजों को नियमित उपचार उपलब्ध हो पा रहा है और उन्हें बड़े शहरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा है।
गरियाबंद जिले के देवभोग क्षेत्र में किडनी रोग लंबे समय से एक गंभीर चुनौती रहा है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की सक्रियता और शासन की पहल से उपचार व्यवस्था अधिक संगठित और सुलभ हुई है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र देवभोग में डायलिसिस सेवाएं नियमित रूप से संचालित हो रही हैं, जिसका सीधा लाभ क्षेत्र के मरीजों को मिल रहा है।
स्वास्थ्य विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार, बीते 10 दिनों में यहां कुल 95 डायलिसिस सत्र आयोजित किए गए हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि औसतन प्रतिदिन लगभग 10 मरीजों को डायलिसिस की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। निरंतर उपचार व्यवस्था से मरीजों को समय पर चिकित्सा सहायता मिल रही है और उनकी स्थिति की नियमित निगरानी भी की जा रही है।
किडनी रोगियों के लिए डायलिसिस एक जीवनरक्षक प्रक्रिया है, जिसे लंबे समय तक नियमित रूप से कराना आवश्यक होता है। इस संदर्भ में प्रदेश सरकार द्वारा अस्पतालों में निःशुल्क डायलिसिस सुविधा उपलब्ध कराना स्वास्थ्य तंत्र की एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो रही है। इससे दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले मरीजों के लिए उपचार की राह काफी आसान हुई है।
प्रदेश स्तर पर भी डायलिसिस सेवाओं के विस्तार, आवश्यक उपकरणों की उपलब्धता तथा चिकित्सा दल की सक्रियता के कारण उपचार व्यवस्था अधिक प्रभावी हो रही है। स्वास्थ्य विभाग अब केवल उपचार तक सीमित न रहकर मरीजों की समय पर पहचान, नियमित जांच और सतत उपचार व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान दे रहा है।
देवभोग में 10 दिनों के भीतर किए गए 95 डायलिसिस सत्र इस बात का संकेत हैं कि क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में निरंतर प्रयास जारी हैं। निःशुल्क डायलिसिस योजना न केवल मरीजों के लिए राहत का माध्यम बनी है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच को भी मजबूत कर रही है।
डायलिसिस सेवाओं के सुचारू संचालन के लिए आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता, उपकरणों के नियमित रखरखाव और मरीजों की सतत निगरानी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। साथ ही, लोगों को समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराने और किडनी रोग के प्रति जागरूक रहने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है, ताकि गंभीर स्थितियों से समय रहते बचाव किया जा सके।

भारत माता वाहिनी योजना से मजबूत हुआ नशामुक्ति जनआंदोलन

18-Feb-2026
रायपुर ( शोर संदेश )   प्रदेश में नशामुक्ति के प्रति व्यापक जनजागरण एवं सामुदायिक सहभागिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से संचालित भारत माता वाहिनी योजना के तहत प्रभावी पहल की जा रही है। राज्य के प्रत्येक विकासखण्ड में 8-सदस्यीय संरचना के साथ कुल 3154 भारत माता वाहिनी समूहों का गठन किया गया है, जो गांव-गांव में नशामुक्ति के संदेश का प्रसार कर रहे हैं।
ग्राम पंचायत स्तर पर महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा नशामुक्ति के समर्थन में रैली, प्रभात फेरी, जनजागरूकता अभियान, नशा छोड़ने का संकल्प एवं शपथ कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इन गतिविधियों से ग्रामीण क्षेत्रों में सकारात्मक सामाजिक वातावरण निर्मित हुआ है तथा युवाओं में नशे के दुष्परिणामों के प्रति जागरूकता बढ़ी है।
राज्य के 25 जिलों में स्वैच्छिक संस्थाओं के माध्यम से 26 नशामुक्ति केंद्र संचालित हैं। इन केंद्रों में अब तक 4379 नशा पीड़ित व्यक्तियों को उपचार एवं पुनर्वास सेवाओं से लाभान्वित किया गया है। केंद्रों में चिकित्सकीय परामर्श, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग, योग एवं अनुशासित दिनचर्या के माध्यम से प्रभावित व्यक्तियों को स्वस्थ जीवन की ओर प्रेरित किया जा रहा है।
जिला बलरामपुर इस अभियान का प्रेरक उदाहरण बनकर उभरा है। यहां सक्रिय भारत माता वाहिनी समूहों द्वारा सतत जागरूकता गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। साथ ही जिले में संचालित नशामुक्ति केंद्र के माध्यम से अब तक लगभग 478 नशा पीड़ित व्यक्तियों को उपचार एवं पुनर्वास का लाभ प्रदान किया गया है, जिससे वे पुनः समाज की मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक जुड़ सके हैं।
उल्लेखनीय है कि नशा केवल व्यक्ति ही नहीं, बल्कि परिवार एवं समाज को भी प्रभावित करता है। इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए राज्य शासन द्वारा जनभागीदारी आधारित मॉडल को अपनाकर नशामुक्ति अभियान को सशक्त रूप से क्रियान्वित किया जा रहा है। भारत माता वाहिनी योजना के माध्यम से प्रदेश को नशामुक्त, स्वस्थ एवं जागरूक समाज की दिशा में आगे बढ़ाने के प्रयास निरंतर जारी हैं।







 

चिकित्सकों की सतर्कता से टली बड़ी अनहोनी, पेरिपार्टम कार्डियक अरेस्ट से प्रसूता की जान बची

17-Feb-2026
रायपुर,   ( शोर संदेश ) स्व. लखीराम अगव्राल स्मृति शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय संबद्ध संत बाबा गुरु घासीदास जी स्मृति शासकीय चिकित्सालय रायगढ़ के चिकित्सकों की तत्परता, उच्चस्तरीय चिकित्सा प्रबंधन और समन्वित टीमवर्क के चलते एक 23 वर्षीय प्रथम गर्भ प्रसूता को पेरिपार्टम कार्डियक अरेस्ट जैसी अत्यंत गंभीर स्थिति से सफलतापूर्वक बचा लिया गया।
मरीज 23 वर्षीय महिला जो पहली बार गर्भवती थीं, को प्री-एक्लेम्पसिया (गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप) की शिकायत थी। जो अत्यधिक गंभीर स्थिति में निजी अस्पताल से मेडिकल कॉलेज के आपातकालीन विभाग में 02 फरवरी 2026 को दोपहर लगभग 12 बजे अत्यधिक उच्च रक्तचाप और सांस लेने में गंभीर तकलीफ के साथ लाया गया । चिकित्सक द्वारा जांच में पल्मोनरी एडीमा (फेफड़ों में पानी भरना) की पुष्टि हुई, जो जानलेवा स्थिति होती है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तत्काल आपातकालीन सिजेरियन सेक्शन (LSCS) का निर्णय  लिया गया। ईलाज के दौरान मरीज को अचानक पेरिपार्टम कार्डियक अरेस्ट (हृदय गति रुकना) हो गया ।
डॉ . ए.एम. लकड़ा (विभागाध्यक्ष एनेस्थीसिया ) ने बताया कि हमारी चिकित्सकीय टीम ने तुरंत स्थिति की पहचान कर उच्च गुणवत्ता वाली सीपीआर (High Quality CPR) प्रारंभ की। त्वरित और समन्वित प्रयासों से मरीज की हृदयगति पुनः स्थापित की गई। इसके बाद मरीज को वेंटिलेटर सपोर्ट पर आईसीयू में रखा गया, जहां गहन निगरानी एवं व्यवस्थित पोस्ट-कार्डियक अरेस्ट केयर प्रदान की गई।
लगभग तीन दिनों तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर रहने के बाद मरीज की स्थिति में लगातार सुधार हुआ। विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में धीरे-धीरे वेंटिलेटर हटाया गया और अंततः 12 फरवरी 2026 को मरीज को आईसीयू से वार्ड में शिफ़्ट किया गया ।आज मरीज को सफलतापूर्वक ईलाज कर डिस्चार्ज किया गया ।
इस जटिल और जीवनरक्षक प्रक्रिया का संचालन एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष डॉ. आनंद मसीह लकड़ा के साथ स्त्री एवं प्रसूति रोग विभागाध्यक्ष डॉ. टी.के. साहू   एवम डॉ. चंद्रभानु पैंकरा, डॉ. अशोक सिंह सिदार, डा. लेश पटेल , डॉ. अनीश ,डॉ. लक्ष्मी यादव, डॉ. अमित भोई, डॉ. सुभाष राज तथा ऑपरेशन थिएटर (OT) स्टाफ ने इस चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में उत्कृष्ट सहयोग रहा ।
अस्पताल अधीक्षक डॉ एम.के. मिंज ने कहा कि यह सफलता समय पर पहचान (Early Recognition), उच्च गुणवत्ता वाली सीपीआर, त्वरित निर्णय, और बहु-विषयक समन्वित टीम के प्रयासों का परिणाम है।यह घटना दर्शाती है कि यदि उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था में विशेषज्ञ चिकित्सकीय देखरेख उपलब्ध हो, तो अत्यंत गंभीर परिस्थितियों में भी जीवन बचाया जा सकता है।
 



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