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सिम्स में हाइडेटिड सिस्ट का पांचवाँ सफल दूरबीन ऑपरेशन

26-Nov-2025
रायपुर, ( शोर संदेश )  छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) बिलासपुर ने जटिल सर्जरी के क्षेत्र में एक और बड़ी कामयाबी दर्ज की है। सर्जरी विभाग की टीम ने दूरबीन (लैप्रोस्कोपिक) तकनीक का उपयोग करते हुए लिवर में मौजूद 10 सेंटीमीटर के हाइडेटिड सिस्ट को सुरक्षित रूप से निकाल दिया। यह सिम्स में इस तरह की पाँचवीं सफल लैप्रोस्कोपिक सर्जरी है।
मुंगेली की 20 वर्षीय तीजन नेताम पेट में भारीपन, भूख कम लगना और असहजता की शिकायत के साथ सिम्स पहुंची। सोनोग्राफी और सीटी स्कैन में लिवर के दाहिने हिस्से में बड़ा हाइडेटिड सिस्ट पाया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए सिम्स प्रशासन के मार्गदर्शन में इसे दूरबीन पद्धति से ऑपरेट करने का फैसला लिया गया।
सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. ओ.पी. राज के नेतृत्व में डॉ. रघुराज सिंह, डॉ. बी.डी. तिवारी और डॉ. प्रियंका माहेश्वर की टीम ने ऑपरेशन को अंजाम दिया। एनेस्थीसिया विभाग से डॉ. मधुमिता मूर्ति, डॉ. भावना रायजादा, डॉ. मिल्टन, डॉ. मयंक आगरे व पीजी रेजिडेंट्स ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रेडियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अर्चना सिंह ने सटीक रिपोर्टिंग कर सर्जरी में अहम सहयोग दिया। ओटी स्टाफ सिस्टर योगेश्वरी, संतोष पांडे और अश्वनी मिश्रा का काम भी सराहनीय रहा। लैप्रोस्कोपिक तकनीक की वजह से बहुत कम चीरा लगा, रक्तस्राव लगभग नगण्य रहा मरीज जल्द ही सामान्य दिनचर्या में लौट सकती है
यह एक परजीवी संक्रमण है, जो इकाईनोकोकस ग्रेन्यूलोसस (कुत्ता फीता कृमि) के कारण होता है। यह आमतौर पर लिवर और फेफड़ों को प्रभावित करता है। संक्रमण अक्सर दूषित पानी, संक्रमित भोजन, और कुत्तों-भेड़ों के संपर्क से फैलता है। इसके मुख्य लक्षण - पेट दर्द, भारीपन, भूख कम लगना, जल्दी पेट भरने का एहसास इसके मुख्य लक्षण है। गहरे और बड़े सिस्ट लीवर की कार्यप्रणाली पर असर डालते हैं और फटने पर ऐनाफाइलैक्सिस जैसी जानलेवा स्थिति भी बन सकती है। स्वच्छ पानी, साफ भोजन और राष्ट्रीय कृमि मुक्ति अभियान के तहत क्रीमनाशक दवाओं का सेवन कर इस रोग से बचाव किया जा सकता है।

रायगढ़ मेडिकल कॉलेज में डेढ़ दशक से गले की बढ़ती गांठ से परेशान महिला का सफल ऑपरेशन

15-Nov-2025
रायपुर,।  ( शोर संदेश )  स्व.लखीराम अग्रवाल स्मृति शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय संबद्ध संत बाबा गुरु घासीदास जी स्मृति शासकीय चिकित्सालय रायगढ़ लगातार अपनी सुविधाओं को बढ़ाने के लिए प्रयास करते हुए मरीज को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा प्रदान कर रही है। इस कड़ी में कान, नाक, गला विभाग द्वारा अधिष्ठाता  डॉ. विनीत जैन एवं अस्पताल अधीक्षक डॉ.मनोज कुमार मिंज के मार्गदर्शन में  डेढ़ दशक से गले की बढ़ती गांठ से परेशान महिला का सफल ऑपरेशन किया गया।
महिला पिछले १५ साल से गले की  बढ़ती गांठ से परेशान थी ,कई जगह इलाज कराया लेकिन कोई राहत नहीं मिली ,कई  बार उसे ऑपरेशन की सलाह दी गई लेकिन डर के कारण उसने इलाज नहीं कराया और इस मध्य उसकी बीमारी बढ़ती रही और अब महिला  का गले के ट्यूमर के आकार  ने विशाल-रूप ले लिया था ।और महिला इस जटिल स्थिति में पहुँच गई कि उसकी सांस नली , खाद्य नली को दबाने लगी । 
कई जगह दिखाने पर ऑपरेशन में आवाज परिवर्तन होने की संभावना एवम् खाद्य नाली में चोट लगने की आशंका बताई गई जिसे सुन वह ऑपरेशन कराने में कोताही करती रही । वह कई जगह के ईलाज से निराश होकर अंततः वह मेडिकल कॉलेज रायगढ़ पहुंची |
ई .एन .टी विभाग की  विशेषज्ञ डॉ नीलम नायक ने प्राथमिक जांच की और उसका उपचार बताया, कान नाक गला रोग के विशेषज्ञों  ने उसके मन की सभी तरह की शंका को दूर किया और तब पश्चात वह सर्जरी के लिए राजी हो गई । ई .एन .टी विभाग की विशेषज्ञ डॉक्टरो की टीम द्वारा ऑपरेशन कर आवाज एवम खाद्य नली को पूर्ण रूप से बचाते हुए ट्यूमर को निकाल कर सफलता पूर्वक इलाज किया गया I महिला के गले का ट्यूमर 12  सेंटीमीटर  आकार था |
ऑपरेशन के बाद कुछ दिनों तक रोगी को आईसीयू में डॉक्टर के निगरानी में रखा गया जहाँ निश्चेतना विभाग , डाइटीशिअन और नर्सेज़ का सहयोग रहा ।अंततः रोगी पूर्णतः स्वस्थ हैं उन्हें डिस्चार्ज किया गया । 
इस बीमारी में गॉयटर (गलगंड) थायरॉयड ग्रंथि का बढ़ना है। यह गर्दन में सूजन के रूप में दिखाई देता है। आयोडीन की कमी इसका एक मुख्य कारण है। लक्षणों में गर्दन में दिखाई देने वाली सूजन, निगलने में कठिनाई, या सांस लेने में परेशानी शामिल हो सकती है। उपचार आयोडीन की कमी को दूर करने, थायरॉयड हार्मोन थेरेपी, या अत्याधिक जटिलता में सर्जरी पर आधारित होता है।
 

 


इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय को मिली राष्ट्रीय मान्यता, अब फसलों-मिट्टी-पानी में कीटनाशक अवशेषों की होगी निगरानी

15-Nov-2025
रायपुर, ।  ( शोर संदेश )  इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय को एक और उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल हुई है। कृषि विश्वविद्यालय द्वारा संचालित फाइटोसैनिटरी लैब अब छत्तीसगढ़ में विभिन्न खाद्यान्न फसलों, फलों, सब्जियों, आदि के साथ ही मिट्टी, पानी जैसे पर्यावरणीय घटको में भी कीटनाशक अवशेषों की निगरानी करेगी। भारत सरकार के कृषि एवं किसान मंत्रालय द्वारा कृषि विश्वविद्यालय के आण्विक जीव विज्ञान एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा संचालित फाइटोसैनिटरी प्रयोगशाला को राष्ट्रीय कीटनाशक अवशेष निगरानी योजना के तहत अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान केन्द्र के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। कृषि विश्वविद्यालय की फाइटोसैनिटरी लैब यह उपलब्धि प्राप्त करने वाली छत्तीसगढ़ की एकमात्र तथा देश की 36वीं प्रयोगशाला है जिसे इस राष्ट्रीय निगरानी कार्यक्रम में शामिल किया गया है। 
गौरतलब है कि भारत सरकार की इस योजना का उद्धेश्य खाद्य पदार्था, मिट्टी एवं जल जैसे पर्यावरणीय नमूनों में कीटनाशक अवशेषों की नियमित निगरानी कर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, जल गुणवत्ता का मूल्यांकन करना तथा एकीकृत कीट प्रबंधन एवं उत्तम कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहन देना है। प्रयोगशाला को मान्यता मिलने से प्रदेश के किसानों की फसलों के साथ-साथ यहां की मिट्टी-पानी में भी कीटनाशक अवशेषों की निगरानी हो सकेगी। कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर प्रयोगशाला से संबंधित वैज्ञानिकों एवं उनके सहयोगियों को बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए कहा है कि यह उपलब्धि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक उत्कृष्टता तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण एवं किसान कल्याण के प्रति विश्वविद्यालय की दृढ़ प्रतिबद्धता का प्रतीक है। 
उल्लेखनीय है कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में फाइटोसैनिटरी प्रयोगशाला की स्थापना राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अन्तर्गत केन्द्र एवं राज्य सरकार से प्राप्त वित्तीय सहायता से हुई है। इस प्रयोगशाला के संचालन के लिए भी केन्द्र और राज्य सरकार से नियमित सहायता प्राप्त हो रही है। प्रयोगशाला में खाद्य पदार्थों में कीटनाशक अवशेषों, हेवी मेटल्स, सूक्ष्मजीवों आदि की जांच की जाती है जिससे इनके निर्यात हेतु मदद मिलती है।



 

मरीजों की सुरक्षा सर्वोपरि: CGMSC ने तीन दवाओं को तीन वर्ष के लिए ब्लैकलिस्ट किया

12-Nov-2025
रायपुर, ( शोर संदेश )। छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड (CGMSC) ने दवाओं की गुणवत्ता में कमी पर सख्त रुख अपनाते हुए तीन दवाओं को अमानक पाए जाने के बाद आगामी तीन वर्षों के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया है। यह कार्रवाई कॉरपोरेशन की “शून्य सहनशीलता नीति (Zero Tolerance Policy)” के तहत की गई है।
कॉरपोरेशन के अनुसार, संबंधित आपूर्तिकर्ता अब ब्लैकलिस्टिंग अवधि समाप्त होने तक किसी भी नई निविदा में भाग लेने के लिए अयोग्य रहेंगे।
ये दवाएं पाई गईं अमानक
मेसर्स एजी पैरेंटेरल्स, विलेज गुग्गरवाला, बद्दी (हिमाचल प्रदेश) द्वारा आपूर्ति की गई —
कैल्शियम (एलिमेंटल) विद विटामिन D3 टैबलेट्स, ऑर्निडाजोल टैबलेट्स 
ये सभी NABL मान्यता प्राप्त एवं सरकारी परीक्षण प्रयोगशालाओं में “अमानक (Not of Standard Quality - NSQ)” पाए गए।
इसी तरह, मेसर्स डिवाइन लेबोरेट्रीज प्रा. लि., वडोदरा (गुजरात) द्वारा आपूर्ति की गई
हेपारिन सोडियम 1000 IU/ml इंजेक्शन IP  भी NABL मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं एवं सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेट्री (CDL), कोलकाता में परीक्षण के दौरान अमानक पाए गए।
इन तीनों उत्पादों को निविदा शर्तों के अनुरूप तत्काल प्रभाव से तीन वर्षों की अवधि तक ब्लैकलिस्ट किया गया है।
गुणवत्ता पर समझौता नहीं
CGMSC ने कहा है कि उसकी गुणवत्ता आश्वासन एवं नियंत्रण नीति के अंतर्गत निरंतर मॉनिटरिंग, बैच-वार परीक्षण, पुनः परीक्षण और गुणवत्ता विचलन पर तत्काल कार्रवाई को प्राथमिकता दी जाती है।
कॉरपोरेशन द्वारा सभी कार्रवाई CDSCO, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 एवं नियम 1945 के प्रावधानों के अनुसार की जाती है ताकि केवल गुणवत्तायुक्त दवाएं ही मरीजों तक पहुँचें।
स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कहा है कि मरीजों की सुरक्षा सर्वोपरि है और इस पर किसी भी स्तर पर कोई समझौता स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि भविष्य में भी दवा गुणवत्ता से जुड़ी किसी भी चूक पर कार्रवाई जारी रहेगी।

 


सुकमा जिले के माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में घर-घर स्वास्थ्य सर्वे

08-Nov-2025
रायपुर, ( शोर संदेश )।  सुकमा कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव के निर्देशन में स्वास्थ्य विभाग द्वारा नियद नेल्लानार योजना के तहत माओवाद प्रभावित कोंटा विकासखंड के 125 गांवों में घर-घर स्वास्थ्य सर्वे अभियान चलाया गया। दुर्गम और पहुंचविहीन क्षेत्रों में संचालित इस अभियान का उद्देश्य ग्रामीणों को उनके द्वार पर ही स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है।
सीएमएचओ डॉ. आर.के. गुप्ता ने बताया कि सर्वे के दौरान संपूर्ण नेत्र सुरक्षा कार्यक्रम पर विशेष ध्यान दिया गया। बीएमओ कोंटा ने जानकारी दी कि सर्वे में 624 मोतियाबिंद मरीजों का चिन्हांकन किया गया है, जिनमें 132 एक आंख में और 492 दोनों आंखों में मोतियाबिंद से पीड़ित हैं। इन सभी मरीजों के लिए जिला अस्पताल में शीघ्र ही विशेष निःशुल्क मोतियाबिंद शिविर आयोजित किए जाएंगे। मरीजों के लाने-ले जाने, भोजन एवं आवास की व्यवस्था जिला प्रशासन द्वारा की जाएगी।








 

जिला चिकित्सालय बलौदाबाजार में डिलीवरी का रिकॉर्ड स्तर,माह अक्टूबर में 456 प्रसव

07-Nov-2025
रायपुर,( शोर संदेश )   जिला चिकित्सालय बलौदाबाजार में अक्टूबर माह के दौरान संस्थागत प्रसव का आंकड़ा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। पूरे महीने में कुल 456 प्रसव दर्ज किए गए जिनमें से 155 प्रसव सी-सेक्शन (शल्य प्रसव) के माध्यम से कराए गए। बढ़ती प्रसव संख्या इस बात की ओर इंगित करता है कि जिला अस्पताल में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं पर लोगों का विश्वास बढ़ा है। 
मुख्य चिकत्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. राजेश कुमार अवस्थी ने बताया कि जिले में लगभग 1400 गर्भवती महिलाओं की एएनसी (प्रसव पूर्व जांच) की गई जो यह दर्शाती है कि नियमित जांच एवं सुरक्षित मातृत्व के प्रति जागरूकता में वृद्धि हुई है।बढ़ते प्रसव मामलों के कारण जिला चिकित्सालय पर कार्यभार भी तेजी से बढ़ा है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार,अधिक संख्या में प्रसव होने से अस्पताल की मातृ एवं शिशु वार्ड पर दबाव बढ़ गया है, जिसके लिए अतिरिक्त संसाधन, मानवबल और व्यवस्थाओं की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। जिसकी व्यवस्था की जा रही है ।
सिविल सर्जन सह मुख्य अस्पताल अधीक्षक डॉ अशोक कुमार वर्मा ने बताया कि बेहतर सुविधाएं, सुरक्षित प्रसव, निशुल्क दवाइयां, 24×7 उपलब्ध स्वास्थ्य स्टाफ तथा सरकार की जनहितैषी योजनाओं के कारण अधिकाधिक प्रसूताएं जिला चिकित्सालय की ओर रुख कर रही हैं। इस प्रकार से जिले मे मातृ और शिशु मृत्यु  कम करने में अपेक्षित सफलता मिलने की संभावना है।


 

बीजापुर में विकास की दस्तक: धुर माओवाद प्रभावित क्षेत्र में पहली बार सात गांवों में लगा मेगा हेल्थ कैंप

06-Nov-2025
रायपुर,  ( शोर संदेश )। कभी माओवाद की छाया में सिमटे बीजापुर जिले के भैरमगढ़ ब्लॉक के इन्द्रावती नदी पार बसे गांवों में अब विकास की नई सुबह दिखने लगी है। छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति 2025 के सकारात्मक परिणाम अब धरातल पर नजर आने लगे हैं। बड़ी संख्या में माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद अब इन दुर्गम इलाकों में प्रशासन ने पहली बार सात गांवों में एक साथ मेगा हेल्थ कैंप का आयोजन किया, जिसने ग्रामीणों के जीवन में उम्मीद की नई किरण जगा दी।
इस अभियान में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम शामिल रही। टीम ने उसपरी, बेलनार, सतवा, कोसलनार, ताड़पोट, उतला और इतामपार गांवों में स्वास्थ्य शिविर लगाए। कुल 989 ग्रामीणों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। कैंप में सामान्य जांच के 777, रक्तचाप 371, मुख कैंसर 344, ब्रेस्ट कैंसर 112, नेत्र जांच 199, दंत जांच 154, टीकाकरण 14, संपूर्ण टीकाकरण 8, मलेरिया 156, क्षय रोग 7 तथा उल्टी-दस्त के 24 प्रकरणों की जांच की गई। इनमें 54 वरिष्ठ नागरिक भी शामिल रहे। 
विशेषज्ञों ने एक बालक को हृदय रोग से ग्रस्त पाया, जिसे ‘चिरायु योजना’ के तहत उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा प्रदान की जाएगी। कैंप के दौरान बीमार ग्रामीणों का मौके पर ही उपचार कर मुफ्त दवाइयों का वितरण किया गया। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अनुरूप साहू और डॉ. बी.एस. साहू ने बताया कि अब दूरस्थ अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाएं सुलभ हो रही हैं, जिससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय सुधार की उम्मीद है। ग्रामीणों में भी अब भय की जगह विश्वास और आशा का माहौल दिखाई दे रहा है। वे शासन-प्रशासन से जुड़कर शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के प्रति सजग हो रहे हैं।
बीजापुर कलेक्टर संबित मिश्रा ने स्वास्थ्य विभाग की टीम को बधाई देते हुए कहा “शासन के निर्देशानुसार प्रशासन अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के लिए संकल्पित है। ‘नियद नेल्लानार योजना’ के तहत अंदरुनी क्षेत्रों में विकास कार्यों में तेजी आई है और प्रशासन की टीमें पूरी तत्परता से काम कर रही हैं।”जिससे बीजापुर में अब सकारात्मक बदलाव नजर आ रहे है।
बीजापुर में यह पहल न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को बढ़ाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रही है, बल्कि यह संदेश भी दे रही है कि अब माओवाद नहीं, मुख्यधारा और विकास ही बीजापुर की नई पहचान बनेगा।
 

बस्तर में स्वास्थ्य क्रांति: 25 वर्षों में मेडिकल कॉलेज, सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और ग्रामीण स्वास्थ्य नेटवर्क मजबूत

31-Oct-2025

रायपुर  ( शोर संदेश )  राज्य गठन के बाद बीते 25 वर्षों में बस्तर संभाग में स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक परिवर्तन और उल्लेखनीय सुधार देखने को मिले हैं। पहले जहां ग्रामीण और अंदरूनी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित थीं, वहीं अब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर जिला अस्पताल तक आधुनिक संसाधनों और विशेषज्ञ डॉक्टरों से सुसज्जित हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के 25 वर्ष पूरे होने पर बस्तर जिले की स्वास्थ्य सेवाओं में आई क्रांतिकारी बदलाव की कहानी प्रेरणादायक है। दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में जहां कभी बुनियादी चिकित्सा सुविधाएं भी दुर्लभ थीं, वहां आज आधुनिक मेडिकल कॉलेज, सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और मजबूत ग्रामीण स्वास्थ्य नेटवर्क खड़े हो चुके हैं। यह प्रगति न केवल लाखों लोगों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ा रही है, बल्कि क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक उन्नति का आधार भी बन रही है।  

वर्ष 2006 में स्थापित यह मेडिकल कॉलेज बस्तर की स्वास्थ्य क्रांति का प्रतीक है। शुरुआत में प्रतिवर्ष 50 सीटों पर प्रवेश के साथ शुरू हुए इस कॉलेज का भूमि पूजन तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा 9 अगस्त 2006 को किया गया। निर्माण कार्य 2010 में शुरू होकर फरवरी 2013 में पूरा हुआ, और 3 अक्टूबर 2013 को मुख्यमंत्री द्वारा इसका लोकार्पण किया गया। मार्च 2014 में जगदलपुर से डिमरापाल में स्थानांतरित होने के बाद, यह कॉलेज प्रदेश का एकमात्र वायरोलॉजी लैब संचालित कर रहा है, जो माइक्रोबायोलॉजी विभाग में स्थित है। भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (एमसीआई) से मान्यता प्राप्त इस संस्थान में एमसीआई मानकों के अनुरूप सभी चिकित्सा उपकरण उपलब्ध हैं। अस्पताल का स्थानांतरण 6 जुलाई 2018 को नए भवन में हो चुका है, जिससे विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाएं और मजबूत हुई हैं। यह कॉलेज न केवल डॉक्टर तैयार कर रहा है, बल्कि महामारी जैसी चुनौतियों से निपटने में भी अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल: बस्तर को मिला विश्व स्तरीय स्वास्थ्य केंद्र
संभाग मुख्यालय जगदलपुर में डिमरापाल स्थित सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल अब बनकर तैयार है और जल्द ही सेवाएं शुरू होने वाली हैं। यह अस्पताल जटिल रोगों के इलाज में क्रांति लाएगा, जहां हृदय, किडनी और न्यूरो जैसी स्पेशलिटी सेवाएं उपलब्ध होंगी। बस्तर जैसे सुदूर क्षेत्र में यह अस्पताल स्थानीय लोगों को बड़े शहरों की यात्रा से मुक्ति दिलाएगा, जिससे समय और खर्च दोनों की बचत होगी।
1937 से बस्तर संभाग का सबसे बड़ा शासकीय अस्पताल महारानी अस्पताल आज भी स्वास्थ्य सेवाओं का मजबूत स्तंभ है। अगस्त 2006 से यह स्व. बलीराम कश्यप चिकित्सा महाविद्यालय सह अस्पताल के रूप में जाना जाता था, जहां 500 बिस्तर सक्रिय थे। 6 जुलाई 2018 से मेडिकल कॉलेज के अलग होने के बाद इसे पुनः महारानी अस्पताल के रूप में स्थापित किया गया। अस्पताल के जीर्णोद्धार के तीन चरणों में धन्वंतरी ओपीडी, सुश्रुत अस्थि रोग शल्य चिकित्सा कॉम्प्लेक्स, डिजिटल एक्स-रे, आईसीयू, मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर जैसी सुविधाएं शुरू की गईं। दूसरे चरण में फिजियोथेरेपी, आयुष विभाग और ऑडिटोरियम जोड़े गए, जबकि तीसरे चरण में कादम्बिनी मातृ-शिशु स्वास्थ्य संस्थान ने गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए टीकाकरण, सोनोग्राफी, प्रसव पूर्व-पश्चात जांच, सामान्य-सिजेरियन डिलीवरी, परिवार नियोजन और सीटी स्कैन जैसी सेवाएं शुरू कीं। वर्तमान में 200 बिस्तरों वाला यह अस्पताल दैनिक 700-800 ओपीडी, 40-45 आईपीडी, 8 प्रसव, 2200-2500 पैथोलॉजी टेस्ट और 65 एक्स-रे संचालित कर रहा है। प्रमुख विभागों में हमर लैब पैथोलॉजी, सर्जरी, मेजर सर्जरी, स्त्री रोग/प्रसूति, नेत्र चिकित्सा, कैंसर, इमरजेंसी, रेडियोलॉजी, शिशु रोग, अस्थि रोग और डायलिसिस शामिल हैं। भविष्य में 12 बिस्तर शिशु आईसीयू, जिला शीघ्र हस्तक्षेप केंद्र और 30 बिस्तर डेडिकेटेड शिशु वार्ड शुरू होने वाले हैं।
महारानी अस्पताल की उत्कृष्टता को कई पुरस्कारों से नवाजा गया है- 2023 में सर्वश्रेष्ठ सिविल सर्जन पुरस्कार, एनक्यूएएस सर्टिफिकेशन से 17 विभागों को राष्ट्रीय प्रमाणन, 2022-23 में कायाकल्प पुरस्कार में राज्य स्तर पर प्रथम स्थान। 2023-24 में कायाकल्प पुरस्कार की कंसिस्टेंसी श्रेणी में सम्मान। अस्थि रोग विभाग में पहली बार हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी शुरू, जिसमें एक महिला का सफल ऑपरेशन।
पिछले 25 वर्षों में बस्तर जिले में 2 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 7 से 8 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 3 शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बढ़े हैं, जिससे 20-30 हजार जनसंख्या पर एक केंद्र उपलब्ध हो गया है। साथ ही, 50 से 60 उप स्वास्थ्य केंद्रों की वृद्धि से 3-5 हजार जनसंख्या और 3-5 किमी दायरे में प्राथमिक सेवाएं पहुंच रही हैं। अधोसंरचना के साथ मानव संसाधन, लैब जांच, ओपीडी/आईपीडी सुविधाओं में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
ये उपलब्धियां छत्तीसगढ़ सरकार की दूरदर्शिता का प्रमाण हैं, जो बस्तर जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे रही हैं।राज्य सरकार की प्राथमिकता सूची में स्वास्थ्य क्षेत्र को शीर्ष स्थान देने के परिणामस्वरूप बस्तर में नए स्वास्थ्य केंद्र, आयुष्मान कार्ड, मातृ एवं शिशु देखभाल सेवाएं, एम्बुलेंस सुविधा और टेलीमेडिसिन सेवा जैसी पहलें सफलतापूर्वक लागू की गई हैं।कोविड-19 महामारी के दौरान बस्तर की स्वास्थ्य व्यवस्था ने मजबूती का परिचय दिया — ऑक्सीजन प्लांट, कोविड अस्पताल और टीकाकरण अभियान ने नए आयाम स्थापित किए।
वर्तमान में बस्तर जिला अस्पताल, मेडिकल कॉलेज और ब्लॉक स्तर के स्वास्थ्य संस्थान आधुनिक उपकरणों, लैब सुविधाओं और विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम से सुसज्जित हैं। आने वाले वर्षों में सरकार का लक्ष्य है कि बस्तर के हर नागरिक को “गांव के पास ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधा” मिले।
 
 

कोरिया जिले में स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापक विस्तार, 25 वर्षों में दर्ज की ऐतिहासिक प्रगति

30-Oct-2025
रायपुर ( शोर संदेश )  कोरिया जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार और गुणवत्तापूर्ण उपचार सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पिछले 25 वर्षों में निरंतर और ऐतिहासिक प्रगति दर्ज की गई है।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार वर्ष 2000 से लेकर 2025 के बीच अनेक उपलब्धियां हासिल की गई है। उप स्वास्थ्य केंद्र 82 से बढ़कर 89, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 8 से बढ़कर 11 तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र 2 से बढ़कर 4 एवं जिला अस्पताल 100 बिस्तर क्षमता से बढ़कर 200 बिस्तर वाला अस्पताल संचालित हो रहा है।
जिले में मातृ एवं शिशु अस्पताल, फर्स्ट रेफरल यूनिट, हमर लैब, एनआरसी, वायरोलॉजी लैब, डायलिसिस, सीटी स्कैन, सोनोग्राफी, ईको मशीन एवं ऑक्सीजन प्लांट की स्थापना की गई है। राज्य का पहला वयोवृद्ध हेल्थ चेकअप सेंटर भी कोरिया जिले में संचालित हो रहा है।
जिले में वर्तमान में 55 चिकित्सक, 11 विशेषज्ञ, 97 नर्सिंग स्टाफ, 16 लैब टेक्नीशियन, 93 एएनएम, 78 एमपीडब्ल्यू, कुल 10 एम्बुलेंस और 07 मुक्तांजलि वाहन उपलब्ध हैं।
आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत अब तक 2,67,244 कार्ड, तथा आयुष्मान वय वंदना योजना के 7,177 कार्ड बनाए जा चुके हैं।
वर्ष 2000 में जिले में केवल 05 आयुर्वेद औषधालय थे जो बढ़कर 7 हो गए हैं। पहले 05 आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी और 02 फार्मासिस्ट नियुक्त थे जबकि अब 07 आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी और 07 फार्मासिस्ट कार्यरत हैं। सभी औषधालय नवीन भवनों में संचालित हो रहे हैं।
जिला अस्पताल बैकुंठपुर में आयुष विंग संचालित है, जहाँ आयुर्वेद एवं पंचकर्म उपचार स्नेहन, स्वेदन, कटिबस्ति, जानुबस्ति, अभ्यंग तथा शिरोधारा आदि विधियों के माध्यम से किए जा रहे हैं। वर्तमान में जिले में आयुर्वेद के 07, होम्योपैथी के 04 तथा यूनानी के 02 आयुष केन्द्र संचालित हैं। इन केंद्रों से अब-तक 8 लाख 88 हजार से अधिक रोगी लाभान्वित हो चुके हैं। जिले के 07 आयुर्वेद औषधालयों में से 05 को आयुष्मान आरोग्य मंदिर के रूप में विकसित किया गया है। वहीं मोबाइल मेडिकल यूनिट (आयुष) के संचालन से ग्रामीण मरीजों का लाभ होने लगा है।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय तथा स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल प्रदेश के सभी गांवों, शहरों खासकर सुदूर गांवों में स्वास्थ्य अधोसंरचना, आधुनिक स्वास्थ्य व आयुष सुविधाओं के विस्तार के लिए लगातार काम कर रहे हैं। निश्चित ही इन 25 बरसों के विकास यात्रा में कोरिया जिला स्वास्थ्य व आयुष के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की है।



 

गले में सूजन और खराश की समस्या से हैं परेशान तो आजमाएं ये घरेलू उपाय

28-Oct-2025

 बारिश के मौसम में, जब हमारी इम्यूनिटी कमज़ोर हो जाती है, तो सर्दी-खांसी और गले से जुड़ी समस्याएं आम हो जाती हैं। कई बार तो गला बैठ जाता है और इन्फेक्शन भी हो जाता है। गले में खराश के कई कारण हो सकते हैं, जैसे धूप से आकर तुरंत ठंडा पानी पी लेना या फिर गले में इन्फेक्शन। लेकिन घबराएं नहीं, कुछ घरेलू उपायों से आप इस समस्या से जल्द राहत पा सकते हैं।

नमक के पानी से गरारा: गले की खराश के लिए यह सबसे आसान और असरदार तरीका है। नमक में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं जो इन्फेक्शन से लड़ने में मदद करते हैं। एक चौथाई चम्मच नमक को एक गिलास गुनगुने पानी में घोलें। दिन में तीन से चार बार इस पानी से गरारे करें, आपको तुरंत आराम मिलेगा।
हल्दी का दूध: हल्दी अपने औषधीय गुणों के लिए जानी जाती है, और यह गले की खराश से निपटने में बहुत फायदेमंद है। एक गिलास पानी में एक चम्मच हल्दी डालकर पाँच मिनट तक उबालें। इस पानी से दिन में दो से तीन बार गरारे करें। यह गले की सूजन और दर्द दोनों में राहत देगा।
कैमोमाइल चाय: यह चाय औषधीय गुणों से भरपूर होती है और गले के इन्फेक्शन और खराश से छुटकारा दिला सकती है। इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुण आँखों, नाक और गले की सूजन से राहत दिलाने में मदद करते हैं।
स्टीम है फायदेमंद: अगर आपके गले में बहुत ज़्यादा सूजन है और बोलने में भी दिक्कत हो रही है, तो स्टीम लेना बहुत फायदेमंद साबित होगा। स्टीम लेने से बंद नसें खुलती हैं और ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है। दिन में 3 से 4 बार स्टीम लेने से आपको काफी आराम मिलेगा।



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